मेरे दादाजी : काफ़ी देर हो गई...

आज मेरे दादाजी घर चले गए, वो भी अकेले!! हमारे घर में दुर्गा-पूजा धूम-धाम से मनाया जाता है, और तब-से जब दादाजी का जन्म भी नही हुआ था। इसलिए उनका इस त्यौहार में जाना जरुरी था। दादाजी मेरे साथ पिछले ७ महीने से रह रहे हैं, पर समय का तो पता ही नहीं चला, कब और कैसे निकल गया। घर से स्टेशन की तरफ़ निकलने से पहले भी मैंने रोज की तरह दादाजी के साथ बहस की, फर्क नही पड़ता किस बात पे, बस की, हालाँकि ऑटो में दोनों शांत बैठे रहे। स्टेशन पहुंचे तो गाड़ी प्लैट्फौर्म १ पे खड़ी थी, इससे पहले दादाजी मुझे कुछ बोलते हम दोनों ट्रेन की तरफ़ चल दिए। मेरे दादाजी को ट्रेन और स्टेशन से कुछ ज्यादा ही लगाव है, जिसके बिना उनके व्यवसाय की कहानी शायद अधूरी है। रेलवे का नाम लेते ही वो एक्स्ट्रा-एक्टिव हो जाते हैं। पर आश्चर्य की बात तो ये है की आज दादाजी बिल्कुल शांत थे। पता नही उनके मन में क्या चल रहा था! ७ महीने घर से बाहर वो आज तक अपनी ज़िन्दगी में नहीं रहे, बस एक बार १ महीने के लिए अमृतसर में रहे थे, जब चाचाजी की तबियत ख़राब हुई थी। वह इंसान जो अपने घर के इतने पास रहे, उसके लिए उससे बिछड़ना और फिर मिलना कितना कठिन समय होता है, शायद उतना ही, जितना मेरे लिए पहली बार होस्टल से घर जाना! मुझे लगा दादाजी के दिमाग में बस यही चल रहा था - घर का नक्शा, बारी की क्यारियां, बुलबुल की पढाई, घर का पूजा-पथ, यज्ञ और बूढे बुजूर्ग दोस्त मंडली। कभी उन्होंने सोचा भी न होगा की पोते से मिलने के चक्कर में वो इतने लंबे अरसे तक इन सब से दूर रहेंगे।