मेरे दादाजी : खराब तबियत

मेरे दादाजी विपरीत विचारों के धारक हैं, अर्थात् कभी वे बिल्कुल शांत रहते हैं तो कभी घर को सर पर उठा लेते हैं, या फिर कभी एक ज्ञानी पुरूष की तरह उपदेश देते हैं तो कभी बच्चों की तरह भोले। ऐसे में उन्हें समझना कभी बिल्कुल सीधा तो कभी बहुत मुश्किल हो जाता है।

पर जो भी हो दादाजी को अपनी बात मनवाना खूब आता है। छोटी-छोटी बातों पर इतने तर्क-वितर्क तो मैंने अपनी जिन्दगी में किसी के साथ नहीं किये होंगे। चाहे वो खाने की कोई पकवान हो या थाली में पड़ा सिर्फ एक चम्मच ज्यादा चावल, दादाजी के पास हर बात को समझाने की तरकीब है। मैं तो फिर भी ढीठ हूँ वरना मेरे भाई-बहन तो दादाजी के सामने बिल्कुल नहीं टिकते। वे सीधे उनकी बात मानने में ही अपनी भलाई समझते हैं। चूँकि मैं बहुत जिद्दी हूँ और मेरी आदतें मन-मुताबिक हैं, मैंने शायद ही दादाजी की हामी में तुरन्त हामी भरी होगी। पर मैं यह दावा नहीं करता कि इस टकराव में जीत सिर्फ मेरी हुई है। दादाजी ने कम नहीं तो बराबरी में मुझे जरूर पटखानी दी होगी। खैर, हमारी यह तकरार तो रोज चलती है।

मेरे दादाजी : दिनचर्या

कई लोग आश्चर्य करते हैं कि मैं अपने दादाजी के साथ रहता हूँ। पर यह सच है। दादाजी मेरे साथ कोई १ साल से ज्यादा समय से रह रहे हैं। शुरूआत मेरी मम्मी से हुई थी। मम्मी कुछ महीने मेरे साथ रहीं और वापस घर चली गई। दीदी को फुरसत मिली तो वह भी कुछ दिन मेरे साथ रह ली। परन्तु दादाजी ही थे जो मेरे साथ लम्बे समय तक रहना चाहते थे। कारण मेरी कमजोर सेहत कह लीजिए या फिर मेरा अकेलापन। मैं दादाजी का शुरू से चहेता भी रहा हूँ। बस, हो गई मेरी और दादाजी की जोड़ी फिट, और हिट भी!

दादाजी पिछले साल की फरवरी माह में यहाँ आए थे। बीच में दुर्गा-पूजा और दीवाली के अवकाश को छोड़ दें तो सारा समय वो मेरे ही साथ थे। दादाजी पेशे से व्यापारी थे, जिन्होंने अपनी कड़ी लगन और मेहनत से काफी धन अर्जित किया, और उनका सद्उपयोग भी। मन, तन और धन से पूर्णतः धर्म के प्रति समर्पित दादाजी हमेशा से ही दान-पुण्य और पूजा-पाठ में लगे रहे। दादाजी की उम्र करीब 85 से 90 साल के बीच में होगी। अपने जीवन का लगभग सारा समय उन्होंने या तो घर पर (जमालपुर, बिहार) या फिर बासुकिनाथ (वैद्यनाथ धाम के पास शिव भगवान का एक तीर्थ-स्थल) में बिताया है। उनके जीवन में यह पहली बार है कि वो घर से दूर इतने दिनों तक रह रहे हैं। शारीरिक रूप से मेरे दादाजी स्वस्थ हैं, हालाँकि उनके कमर में कुछ सालों पहले एक घातक फ्रैक्चर होने के कारण हल्का भारपन बना रहता है।

भक्ति कुंज

॥ॐ॥

भक्ति कुंज में सिर्फ़ ईश्वर की आराधना होती है। जैसे डिस्को में डांस और मयूज़िक साथ-साथ होते हैं, उसी तरह भक्ति कुंज में भजन और लीला दोनो के बिना मज़ा नहीं आता। वैसे तो ईश्वर की मूर्ति हर मंदिर में है। और हर मंदिर में प्रतिदिन भजन और पूजन किया ही जाता है। परन्तु जब किसी नुक्कड़ में हारमोनियम, तबला और करताल के साथ भजन मंडली बैठती है, तो वहोँ भक्तों की भीड़ जमा हो जाती है। संक्षिप्त में कहूँ तो हमारा घर एक डिस्को थिएटर ही है, बस फ़र्क इतना कि फिल्मी और अंग्रेज़ी गानों की जगह भजन और किर्तन बजते हैं, और राम की लीला में लोग झूम उठते हैं।

मेरे पिताजी का शुरू से ही पूजा अर्चना की तरफ झुकाव रहा है। हालाँकि वो रोज़ दो घंटे पूजा तो कर ही लेते होंगे, और जिसके भोग का रस उन्हें प्रतिदिन प्राप्त हो भी रहा था, पर शायद उसमे कहीं भक्ति का रस सूखा-सा जा रहा था। लगभग इस सदी की शुरूआत में पापा ने अपने चबुतरे पर रामायण-पाठ की पुनर्शरूयात की (इसी चबुतरे पर हमारे दादाजी ने कई सालों तक रामलीला करवाई थी, जो कुछ कारणों से लगभग दस साल तक बंद रही) । भक्ति और संगीत के गुण पिताजी में मौजूद हैं ही, साथ में कुछ करीबी दोस्तों ने मिलकर हाथ बँटाया, और हो गयी मंडली तैयार। कहते हैं ढूँढने से भगवान भी मिलते हैं, भक्तों की तो कमी ही नहीं दुनिया में। पिताजी गाने-बजाने का सामान तो खरीद लाए ही, मंडली में हारमोनियम और तबला के पारखी भी जुट गए। फिर क्य़ा था, दो लाउडस्पीकर छत के ऊपर लगा दिया और माताजी ने अपनी सहेलियों को मंच पर बुला लिया। सबने लिया प्रेम से श्रीराम का नाम और हो गई ईश्वर-वंदना शुरू।

बहारों को चमन याद आ गया है...

ग़ज़ल - ग़ुलाम अली

बहारों को चमन याद आ गया है,
मुझे वो गुलबदन याद आ गया है।

लचकती शाख ने जब सर उठाया,
किसी का बाकपन याद आ गया है।

तेरी सूरत को जब देखा है मैंने,
उरुजू-ऐ-फिक्र-ओ-फन याद आ गया है।

मिले वो अजनबी बनकर तो रफ़्वयत,
ज़माने का चलन याद आ गया है।

बहारों को चमन याद गया है,
मुझे वो गुलबदन याद गया है