भक्ति कुंज

॥ॐ॥

भक्ति कुंज में सिर्फ़ ईश्वर की आराधना होती है। जैसे डिस्को में डांस और मयूज़िक साथ-साथ होते हैं, उसी तरह भक्ति कुंज में भजन और लीला दोनो के बिना मज़ा नहीं आता। वैसे तो ईश्वर की मूर्ति हर मंदिर में है। और हर मंदिर में प्रतिदिन भजन और पूजन किया ही जाता है। परन्तु जब किसी नुक्कड़ में हारमोनियम, तबला और करताल के साथ भजन मंडली बैठती है, तो वहोँ भक्तों की भीड़ जमा हो जाती है। संक्षिप्त में कहूँ तो हमारा घर एक डिस्को थिएटर ही है, बस फ़र्क इतना कि फिल्मी और अंग्रेज़ी गानों की जगह भजन और किर्तन बजते हैं, और राम की लीला में लोग झूम उठते हैं।

मेरे पिताजी का शुरू से ही पूजा अर्चना की तरफ झुकाव रहा है। हालाँकि वो रोज़ दो घंटे पूजा तो कर ही लेते होंगे, और जिसके भोग का रस उन्हें प्रतिदिन प्राप्त हो भी रहा था, पर शायद उसमे कहीं भक्ति का रस सूखा-सा जा रहा था। लगभग इस सदी की शुरूआत में पापा ने अपने चबुतरे पर रामायण-पाठ की पुनर्शरूयात की (इसी चबुतरे पर हमारे दादाजी ने कई सालों तक रामलीला करवाई थी, जो कुछ कारणों से लगभग दस साल तक बंद रही) । भक्ति और संगीत के गुण पिताजी में मौजूद हैं ही, साथ में कुछ करीबी दोस्तों ने मिलकर हाथ बँटाया, और हो गयी मंडली तैयार। कहते हैं ढूँढने से भगवान भी मिलते हैं, भक्तों की तो कमी ही नहीं दुनिया में। पिताजी गाने-बजाने का सामान तो खरीद लाए ही, मंडली में हारमोनियम और तबला के पारखी भी जुट गए। फिर क्य़ा था, दो लाउडस्पीकर छत के ऊपर लगा दिया और माताजी ने अपनी सहेलियों को मंच पर बुला लिया। सबने लिया प्रेम से श्रीराम का नाम और हो गई ईश्वर-वंदना शुरू।