मेरे दादाजी : दिनचर्या

कई लोग आश्चर्य करते हैं कि मैं अपने दादाजी के साथ रहता हूँ। पर यह सच है। दादाजी मेरे साथ कोई १ साल से ज्यादा समय से रह रहे हैं। शुरूआत मेरी मम्मी से हुई थी। मम्मी कुछ महीने मेरे साथ रहीं और वापस घर चली गई। दीदी को फुरसत मिली तो वह भी कुछ दिन मेरे साथ रह ली। परन्तु दादाजी ही थे जो मेरे साथ लम्बे समय तक रहना चाहते थे। कारण मेरी कमजोर सेहत कह लीजिए या फिर मेरा अकेलापन। मैं दादाजी का शुरू से चहेता भी रहा हूँ। बस, हो गई मेरी और दादाजी की जोड़ी फिट, और हिट भी!

दादाजी पिछले साल की फरवरी माह में यहाँ आए थे। बीच में दुर्गा-पूजा और दीवाली के अवकाश को छोड़ दें तो सारा समय वो मेरे ही साथ थे। दादाजी पेशे से व्यापारी थे, जिन्होंने अपनी कड़ी लगन और मेहनत से काफी धन अर्जित किया, और उनका सद्उपयोग भी। मन, तन और धन से पूर्णतः धर्म के प्रति समर्पित दादाजी हमेशा से ही दान-पुण्य और पूजा-पाठ में लगे रहे। दादाजी की उम्र करीब 85 से 90 साल के बीच में होगी। अपने जीवन का लगभग सारा समय उन्होंने या तो घर पर (जमालपुर, बिहार) या फिर बासुकिनाथ (वैद्यनाथ धाम के पास शिव भगवान का एक तीर्थ-स्थल) में बिताया है। उनके जीवन में यह पहली बार है कि वो घर से दूर इतने दिनों तक रह रहे हैं। शारीरिक रूप से मेरे दादाजी स्वस्थ हैं, हालाँकि उनके कमर में कुछ सालों पहले एक घातक फ्रैक्चर होने के कारण हल्का भारपन बना रहता है।

दादाजी के प्रतिदिन का कार्यक्रम सरल-सा है। सुबह 2:30 से 3:30 के बीच में उठना और नहा-धोकर सीधे पूजा पर बैठ जाना। पूजा की प्रक्रिया थोड़ी लम्बी चलती है। इसमें देव-देवताओं की अर्चना और कर्मों का पश्चाताप, गुरूजी के लिए भजन और योग शामिल हैं। लगभग 4 घंटे बाद पूजा कोई 8 बजे खत्म होती है। कोई एकाध घंटा विश्राम करने के बाद वो अपने रोज के कार्यों में लग जाते हैं। इसमे अपने पोते के लिए (यानि मेरे लिए) भोजन तैयार करना, घर ठीक करना और नींद से मुझे उठाना शामिल है। कोई 11-12 बजे दादाजी का नाश्ता और दोपहर का खाना एक साथ ही होता है। इसके पश्चात दादाजी आराम करते हैं और समय मिलने पर गीतापाठ भी कर लेते हैं। धूप छटते ही दादाजी के शाम का कार्यक्रम शुरू होता है। कोई 4 बजे शाम को दादाजी टहलने के लिए निकलते हैं। कोई 4-5km चलने और तीन-माला घर की सीढियाँ चढते-चढते थक के लगभग चूर हो चुके दादाजी 6 बजे तक घर लौटकर आ जाते हैं। तत्पश्चात एक ग्लास शर्बत और कुछ नाश्ता करने के बाद ही उन्हें थोड़ा चैन मिलता है। रात का खाना भी मेरे दादाजी ही बनाते हैं। हालाँकि खाना बनाने का समय मेरे ऑफिस के लौटने के समय पर निर्भर करता है, फिर भी 9-10 बजे तक रात्री-भोजन हो ही जाता है। रात को ज्यादा नींद तो नहीं आती, पर दादाजी आराम करने की भरसक कोशिश करते हैं। जो भी हो, अगली सुबह 3 बजे यही कार्यक्रम पुनः शुरू हो जाता है।

इस भागती जिन्दगी में ज्यादा समय तो मिलता नहीं, फिर भी दादाजी के साभ रोचकपूर्ण संवाद होते रहते हैं। चाहे वो रोजमर्रा की जिन्दगी हो या फिर उनके लम्बे जीवन का अनुभव, इनसे मुझे काफी ज्ञान की प्राप्ति हुई है। दादाजी के विशय में कई बातें तो मैंने बचपन में भी जानी थी, पर इनका अर्थ और मूल्य अब मुझे समझ में आ रहा है।

4 टिप्‍पणियां:

  1. aap bhagya shali hain jo dada ji ke sath rahate hain lekin sham ka khana unke dwara banane wali baat jami nahin

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  2. मेरे पास इसका कोई उत्तर नहीं है.. इसे या तो दादाजी की जिद कहिए या मेरा आलस्य, भोजन तो दादाजी के हाथों ही तैयार होता है.. नौकर दादाजी को पसन्द नहीं हैं..

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  3. दादा पोता में अद्भुत सामंजस्‍य

    बहुत अच्‍छा अहसास हो रहा है

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