मेरे दादाजी : खराब तबियत

मेरे दादाजी विपरीत विचारों के धारक हैं, अर्थात् कभी वे बिल्कुल शांत रहते हैं तो कभी घर को सर पर उठा लेते हैं, या फिर कभी एक ज्ञानी पुरूष की तरह उपदेश देते हैं तो कभी बच्चों की तरह भोले। ऐसे में उन्हें समझना कभी बिल्कुल सीधा तो कभी बहुत मुश्किल हो जाता है।

पर जो भी हो दादाजी को अपनी बात मनवाना खूब आता है। छोटी-छोटी बातों पर इतने तर्क-वितर्क तो मैंने अपनी जिन्दगी में किसी के साथ नहीं किये होंगे। चाहे वो खाने की कोई पकवान हो या थाली में पड़ा सिर्फ एक चम्मच ज्यादा चावल, दादाजी के पास हर बात को समझाने की तरकीब है। मैं तो फिर भी ढीठ हूँ वरना मेरे भाई-बहन तो दादाजी के सामने बिल्कुल नहीं टिकते। वे सीधे उनकी बात मानने में ही अपनी भलाई समझते हैं। चूँकि मैं बहुत जिद्दी हूँ और मेरी आदतें मन-मुताबिक हैं, मैंने शायद ही दादाजी की हामी में तुरन्त हामी भरी होगी। पर मैं यह दावा नहीं करता कि इस टकराव में जीत सिर्फ मेरी हुई है। दादाजी ने कम नहीं तो बराबरी में मुझे जरूर पटखानी दी होगी। खैर, हमारी यह तकरार तो रोज चलती है।