मेरे दादाजी : खराब तबियत

मेरे दादाजी विपरीत विचारों के धारक हैं, अर्थात् कभी वे बिल्कुल शांत रहते हैं तो कभी घर को सर पर उठा लेते हैं, या फिर कभी एक ज्ञानी पुरूष की तरह उपदेश देते हैं तो कभी बच्चों की तरह भोले। ऐसे में उन्हें समझना कभी बिल्कुल सीधा तो कभी बहुत मुश्किल हो जाता है।

पर जो भी हो दादाजी को अपनी बात मनवाना खूब आता है। छोटी-छोटी बातों पर इतने तर्क-वितर्क तो मैंने अपनी जिन्दगी में किसी के साथ नहीं किये होंगे। चाहे वो खाने की कोई पकवान हो या थाली में पड़ा सिर्फ एक चम्मच ज्यादा चावल, दादाजी के पास हर बात को समझाने की तरकीब है। मैं तो फिर भी ढीठ हूँ वरना मेरे भाई-बहन तो दादाजी के सामने बिल्कुल नहीं टिकते। वे सीधे उनकी बात मानने में ही अपनी भलाई समझते हैं। चूँकि मैं बहुत जिद्दी हूँ और मेरी आदतें मन-मुताबिक हैं, मैंने शायद ही दादाजी की हामी में तुरन्त हामी भरी होगी। पर मैं यह दावा नहीं करता कि इस टकराव में जीत सिर्फ मेरी हुई है। दादाजी ने कम नहीं तो बराबरी में मुझे जरूर पटखानी दी होगी। खैर, हमारी यह तकरार तो रोज चलती है।

जैसा मैंने पहले भी कहा, दादाजी की तबियत बहुत दुरूस्त है। और इसका श्रेय शत्-प्रतिशत् दादाजी को ही जाता है। तन्द्रुस्त शरीर, पौष्टिक भोजन, योगा और कसरत, चिंतन और ध्यान दादाजी के मन और तन को ताजा बनाए रखता है। इसलिए दादाजी बीमार कम ही पड़ते हैं, पर अगर पड़ें तो मेरी चिंता की घंटी बजने लगती है।

लगभग एक हफ्ते से दादाजी की तबियत खराब है। पिछले शनिवार चेन्नई जाने से पहले दादाजी की कमर में दर्द शुरू हुआ था। हालाँकि दर्द बर्दाश्त के लायक था, फिर भी दादाजी के कमर की हालत नाजुक होने के कारण मेरा चिंतित होना स्वाभाविक था। पापाजी से कुछ दवाई और कसरत का सुझाव लेकर मैंने दादाजी को समझाया, और जल्द ही ठीक होने का आश्वासन देकर मैं चेन्नई के लिए निकल पड़ा। सोमवार को जब मैं लौटा तो उनकी हालत में काफी सुधार था, जबकि मेरी हालत में हल्की गड़बड़ियाँ दिखने लगी थीं( खैर यह तो हर सफर के बाद मेरे साथ होता है)।

मम्मी और पापा ने दीदी के हाथों ढेर सारा सामान भिजवाया था। चेन्नई में मैं जब दीदी से मिला तो मुझे एक बैग भड़ा सामान उसने थमा दिया। आम, लीची, गुरम्मा (टिकोला/कच्चा आम की चटनी) और मिठाई से भरा बैग मैं खुशी-खुशी घर लेकर आ गया। आम थोड़े कच्चे थे पर लीची तो बहुत मीठे थे। मन भर मैंने और दादाजी ने लीची का आनन्द लिया और मन ही मन पापाजी को धन्यवाद भी किया। आखिर यहाँ ऐसे स्वादिष्ट फल कहाँ मिलते हैं!

धीरे धीरे सब-कुछ ठीक हो रहा था पर शायद नहीं भी। कमर दर्द ठीक होने के बाद बृहस्पत को दादाजी की पेट खराब हो गई। शरीर में खिंचाव और दर्द होने लगा। हल्की तेल-मालिश के बाद दादाजी को थोड़ा चैन मिला। चूँकि दादाजी ने मुझे एक दिन बाद इसके बारे में बताया, दवाई तो अगले दिन ही देनी पड़ी। फिर धीरे-धीरे तबियत में मजबूती आई ही थी कि फिर से खराब हो गई।

अभी दादाजी की तबियत नियंत्रण में है और मेरी भी। हालाँकि खाने-पीने का हिसाब बिल्कुल बिगड़ा हुआ है। पेट की खराबी के कारण दादाजी के खाने-पीने में भी ढील आ गई थी। इसलिए उनका शरीर कमजोर हो गया है। यहाँ का मौसम भी कभी गर्मी, कभी ठंड तो कभी बरसाती हो जाता है, इसलिए बुखार और सर्दी के भी हल्के लक्षण आ गये हैं। तबियत को पूर्णतया ठीक होने में कुछ समय तो लगेगा ही।

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