श्रुति अनुवाद : भाषा लिप्यन्तरण से लिपिरहित बोली (भाग-१)

पिछले कुछ दिनों से मैं संस्कृत के अन्य भारतीय लिपियों में लिप्यन्तरण पर काम कर रहा हूँ। इससे मुझे संस्कृत के श्रुति रूप अर्थात् लिपिरहित रूप की जानकारी मिली, और साथ ही अन्य भाषाओं की आपसी समानता पर भी ध्यान गया। भारतीय सरकार कुछ गिने-चुने भाषाओं को संवैधानिक मह्त्व देती है, जबकि पूरे भारत में लगभग २००-३०० भाषायें हैं जिनका प्रयोग लोग प्रतिदिन करते हैं, और ना जाने कितने लुप्त भी हो गये हैं। राजनीतिक कारणों को छोड़ दें तो इन्हें भाषा का स्थान ना देने के मुख्य कारण हैं इनकी कोई विशिष्ट लिपि ना होना, अर्थात् किसी अन्य प्रमुख भाषा की लिपि का प्रयोग, या शब्दावली समान होना, या उस भाषा में लिखे काव्यों और ग्रन्थों का अभाव इत्यादि। अतः इन्हें बोली का स्थान दिया गया है।

भाषा या बोली, इसका प्रयोग आज भी लाखों लोग करते हैं। भारत में भाषा का मुख्य रूप बोली ही है। लिप्यन्तरण मात्र लिपि का रूप बदलती है, अर्थात् श्रुति रूप वही होता है, अतः लिपि के ज्ञान के बिना उसे भी नहीं पढ़ा जा सकता। अतः लिप्यन्तरण के स्थान पर अगर श्रुति-अनुवाद हो, जिसमें एक बोली के शब्दों, वाक्यों को दूसरी बोली के शब्दों,वाक्यों में परिवर्तित कर समझने में आसान बनाया जा सकता है।

भारतीय भाषा के लिये अनुवाद की वर्तमान स्थिति
१) अंग्रेजी से भारतीय भाषा में अनुवाद करने में अ) व्याकरण की परेशानी आ) शब्दों का अमेल इ) भाव का अमेल जैसी समस्यायें आती हैं।
२) लगभग सभी भारतीय भाषा का व्याकरण समान है, मूलतः संस्कृत पर आधारित।
३) कई शब्द भारतीय भाषाओं में समान या समरूप हैं, मूलतः संस्कृत के शब्द।
४) लोकोक्ति, भाव, कथा इत्यादि मिलते हैं, मूलतः इनके स्त्रोत गीता, रामायण, महाभारत जैसे ग्रन्थ हैं।

भाषा का संस्कृत रूप
माने या ना माने, भारत की भाषायें संस्कृत से बहुत मेल खाती हैं। भाषायें प्रायः क्षेत्रिय रूप में विद्यमान हैं। कई भाषाओं को तो भारत सरकार ने भाषा का स्थान भी नहीं दिया है, जैसी मेरी भाषा अंगिका। इन सभी भाषाओं के गीत, लोकोक्तियाँ, बोलने की शैली इत्यादि अलग-अलग हैं और स्थानीय रूप को सुदृढ़ करती हैं। संस्कृत के जैसे ही, लिखना और पढ़ना शिक्षा का महत्वपूर्ण अंग नहीं, बल्कि श्लोक, गीत, गुरूवाणी इत्यादि को याद रखना ही सच्ची शिक्षा के रूप में जानी गयी है। सबसे बड़ी बात, मुख्यतः हम भाषा का बोलचाल में प्रयोग करते हैं, लिखने-पढ़ने का कम।

भाषा - श्रुति रूप
भारत में बोली ही भाषा है और भाषा ही बोली है। एक समय था जब पूरे के पूरे ग्रन्थ ऋषि-मुनि याद रखते थे और अपने शिष्यों को पढ़ाते थे (लगभग ३००० वर्ष पूर्व)। अतः इस रूप का आलिङ्गन करके ही भारत की भाषाओं का लिखित रूप में विकास हो सकता है। एक ही शब्दार्थ को दूसरे भाषा में कैसे बोलें, किस तरीके से बोलें, किसी वाक्य का रूप दूसरे भाषा में उचित रूप में कैसा होगा, इत्यादि, ना ही बहुत कठिन हैं, बल्कि ये रूप लिखित रूप में भी नहीं होते। भाषा का पूर्ण रूप तो उसके बोल-चाल अर्थात् श्रुति रूप में ही निहित है।

लिखित रूप में अनुवाद
प्रायः अनुवाद से तात्पर्य किसी लेख के लिखित रूप का दूसरे भाषा में अर्थानुसार परिवर्तित करने से है। सूचना प्रौद्योगिकी में अनुवाद का तात्पर्य शब्द-बनाम्-शब्द और वाक्य-बनाम्-वाक्य हो जाता है। कारण यह कि अभी तक किसी वाक्य को समझने और उसे पुनः लिखने की क्षमता अच्छी तरह से विकसित नहीं हो पाई है। तरीका अच्छा है, पर शब्द के विकार, संधि, वाक्य रचना इत्यादि में यह चूक जाता है। अर्थात् हमें नयी भाषा में शब्दार्थ तो मिल जाते है, पर भाषा की संरचना की उपेक्षा हो जाती है, क्योंकि हम शब्दों को ढ़ूँढ़ते हैं, और उससे अर्थ निकाल लेते हैं, अतः भाषा की संरचना सही नहीं होने पर भी अनुवाद ठीक-ठाक, काम-चलाऊ हो जाता है।

श्रुति रूप का श्रुति रूप में अनुवाद
वहीं एक दूसरे तरीके में, किसी लेख के श्रुति रूप को ही दूसरे भाषा के श्रुति रूप में परिवर्तित किया जा सकता है। जैसे "मैं जाता हूँ" का अंगिका श्रुति अनुवाद "हम्मऽ जाय छियै" होगा। भारत की लगभग सभी भाषाओं की संरचना एक समान है, एक ही व्याकरण है, एक ही मूल शब्दावली है, और सबसे बड़ी बात एक जीवंत समाज है जो इन रूप को संजोये रखता है और इसका विकास तत्पर करता रहता है। श्रुति अनुवाद के कई लाभ हैं,
    १) बोलचाल में अक्सर प्रयुक्त आने वाली शब्दावली कम होती हैं
    २) एक ही तरह के शब्द और वाक्य का प्रयोग प्रायः होता है, बार-बार होता है। कुछ शब्दों और वाक्यों से ही भिन्न मतलब निकाल लिये जाते हैं।
    ३) भाषा के स्वच्छ स्वरूप, जो कि श्रुति रूप है, का संयोजन
    ४) इसमें पढ़ने और लिखने की आवश्यकता नहीं, बस समझने की है जिससे एक निरक्षर भारतीय भी संवाद कर सकता है।
    ५) भारतीय भाषाओं में आने वाले वेबसाइट और जालपृष्ठों को सहज ही दूसरे भाषा में सुना जा सकता है, बिना उस लिपि या अपने लिपि का ज्ञान रखे हुये।
    ६) टीवी पर और रेडियो पर आने वाले कार्यक्रम को सहज ही दूसरी भाषाओं में सभी के लिये उपलब्ध कराया जा सकता है, इसके लिये अलग-अलग रिकौर्डिंग की आवश्यकता नहीं
    ७) ऐसे उपकरण को आसानी से किसी के भी मोबाइल यंत्र में स्थापित किया जा सकता है, जो कि लगभग सभी भारतीय के पास है, जो ससता है, और जिसमें माइक और स्पीकर हमेशा उपलब्ध रहते हैं।
    ८) किसी पुस्तक के अनुवाद के लिये मोबाइल कैमरा का सहज ही प्रयोग किया जा सकता है, जो पृष्ठ के लेख को पढ़कर उसका अनुवादित श्रुति रूप सुना सकता है।
    ९) बोली का रूप समय के साथ बदलता रहता है, जबकि लिखित रूप मूलतः समान रहता है। अतः श्रुति अनुवाद भी समाज के बदलाव के साथ बदल जाता है। 

संस्कृत लिप्यन्तकरण : उपकरण उत्थान संबंधी सुझाव (भाग-७)

१) उपकरण के प्रयोग-आँकड़े : इनको इकट्ठा करना आवश्यक है। इसके लिये जब भी लिप्यन्तरक का कार्य किया जाये, उस डोमेन के लिये एक प्रयोग गिनती बढ़ाई जा सकती है। इससे नये वेबसाइट उपकरण प्रयोग करने से पहले आँकड़े देख सकते हैं।

२) उपकरण के अशुद्धियाँ आँकड़े : उपकरण पूर्णतः सही ना होने से इसमें गलतियाँ होना स्वाभाविक है। विशेष वर्ण, चिन्ह और स्वर के लिये जिनमें अशुद्धियाँ अधिक होने की सम्भावना है, उनके आँकड़ें संयोजे जा सकते हैं।

३) ब्लौग उपकरण के लिये प्लगिन : ब्लौग जैसे ब्लौगर, लाइवजरनल, वर्डप्रेस, टाइपपैड इत्यादि के लिये सहज प्लगिन जिससे इस उपकरण का प्रयोग सुगमता से किया जा सके।

४) गूगल ऐप ईंजन एकाकीकरण : गूगल कोड परियोजना सम्बन्धी जानकारी और चर्चा के लिये अच्छी  है। पर कोड चलाने और उसके प्रयोग आँकड़े इकट्ठा करने के लिये इसके पास सही साधन नहीं है। इसके लिये गूगल ऐप ईंजन और क्लाउड एसक्यूएल का प्रयोग किया जा सकता है।

संस्कृत लिप्यन्तरण
सार्वभौमिक और स्वचालित (भाग-१)
उपकरण रूपरेखा (भाग-२)
विकि विशेष (भाग-३)
तकनीकि विवरण (भाग-४)
संस्कृत वेबसाइट एकीकरण (भाग-५)
भारतीय भाषा अंतः लिप्यन्तरण परियोजना (भाग ६) 
उपकरण उत्थान संबंधी सुझाव (भाग-७)

संस्कृत लिप्यन्तरण : भारतीय भाषा अंतः लिप्यन्तरण परियोजना (भाग ६)

संस्कृत लिप्यन्तरण का गूगल कोड पर निर्यात
संस्कृत लिप्यन्तरण उपकरण अब गूगल कोड पर जीएनयू लाइसेन्स के अन्तर्गत कोड के मुक्त स्त्रोत के रूप में उपलब्ध है। इसके कई लाभ हैं,
१) अंतर्जाल पर अन्य रूचिकर मित्र इसमें एसवीएन के माध्यम से योगदान कर सकते हैं
२) इसके डाउनलोड पृष्ठ पर उपकरण, प्रलेख, परीक्षण इत्यादि जानकारी सुगम उपलब्ध हैं
३) विकि पृष्ठों की सहायता से उपकरण को सुगमता से समझाया जा सकता है
४) गूगल के विस्तारित बुनियादी सुविधाओं जैसे अंतर्जाल से डाउनलोग गति, अधिक एचटीटीपी कनेक्शन, इत्यादि उपकरण के लिये लाभदायक हैं

उपकरण प्रयोग निर्देश
इसकी जानकारी सामान्य प्रयोग निर्देश पर दी गयी है।

भारतीय भाषा अंतः लिप्यन्तरण परियोजना
संस्कृत लिप्यन्तरण परियोजना का भारतीय भाषा अंतः लिप्यन्तरण परियोजना के रूप में विस्तार किया गया है। शुद्ध संस्कृत पर हालांकि क्षेत्रिय विषमतायें कम हैं, और क्षेत्रिय भाषाओं में विशेष वर्णों का अधिक प्रयोग होता है, फिर भी एस प्रयास से किसी भी भारतीय भाषा में लिखे लेख को अपनी लिपि में पढ़ा जा सकेगा।

इसमें प्रत्येक भारतीय भाषा के लिये एक लिप्यन्तरक का निर्माण होगा। यह स्थानीय लिपि को देवनागरी में परिवर्तित कर सकेगा।

सम्बन्धित क्षेत्रों की लिपियाँ आपस में जुड़ी होती हैं। अतः भारत के पूर्वी क्षेत्र (बंगाली, असमिया, नागपुरी इत्यादि), दक्षिणि क्षेत्र (कन्नड़, तेलुगू, मलयालम) इत्यादि के लिये लिप्यन्तरक भी बनाया जा सकता है।

भारतीय भाषा अंतः लिप्यन्तरण परियोजना : लक्ष्य और लाभ
इस परियोजना से जावास्कृप्ट का एक साधारण उपकरण बनाया गया है, जो किसी भी वेबसाइट के लेख को एक लिपि से दूसरे लिपि में लिप्यन्तरिक कर सकेगा।
१) तत्क्षण : उपकरण तुरन्त ही लेख का लिप्यन्तरण करेगा, जिससे पृष्ठ पढ़ने में तनिक भी परेशानी नहीं होगी।
२) सहज एकाकीकरण : जैसा कि सामान्य प्रयोग निर्देश पर समझाया गया है, किसी भी वेबसाइट से इस उपकरण को जोड़ना बहुत आसान है।
३) लघु भार : यह उपकरण १०केबी से भी हल्का है, अतः इसके लोड होने में समय बिल्कुल नहीं लगेगा।
४) सुरक्षित : यह उपकरण पूर्णतः सुरक्षित है। यह ना हि वेबसाइट की किसी जानकारी को पढ़ता, बदलता या संयोजता है।
५) आंशिक लिप्यन्तरण : पृष्ठ के किसी विशेष भाग के लिप्यन्तरण की सुविधा।
६) गूगल कोड : अंतर्जाल पर होने से वेबसाइट की अंतर्जाल गति भी कम नहीं होता, कोड हमेशा उपलब्ध रहता है।
७) संयोजन और प्रिण्ट : पृष्ठ के लिप्यन्तरण हो जाने के पश्चात् इसे लिप्यन्तरित रूप में संयोजा और प्रिण्ट किया जा सकता है।

संस्कृत लिप्यन्तरण
सार्वभौमिक और स्वचालित (भाग-१)
उपकरण रूपरेखा (भाग-२)
विकि विशेष (भाग-३)
तकनीकि विवरण (भाग-४)
संस्कृत वेबसाइट एकीकरण (भाग-५)
भारतीय भाषा अंतः लिप्यन्तरण परियोजना (भाग ६)
उपकरण उत्थान संबंधी सुझाव (भाग-७)

संस्कृत लिप्यन्तरण : वेबसाइट पर लिप्यन्तरक लगाने की विधि (भाग-५)

संस्कृत लिप्यन्तरक को सिर्फ विकि पर ही नहीं, किसी सामान्य वेबसाइट पर भी जोड़ा जा सकता है।

१) जावास्कृप्ट टूल : औन्लाइन होने से इसके कई फायदे हैं। इसे आसानी से पृष्ठ के हेडर भाग में जोड़ा जा सकता है। भाषा सूची को भी पृष्ठ के ऊपरी कोने में लगाया जा सकता है।

२) पूर्ण संस्कृत वेबसाइट : ऐसे पृष्ठ जिनमें मात्र संस्कृत पाठ ही हैं, उन्हें पूरी तरह से लिप्यन्तरित किया जा सकता है।

३) अंशतः संस्कृत वेबसाइट : अधिकांशतः पन्नों में संस्कृत अंशतः मौजूद होती है, जैसे श्लोक इत्यादि की व्याख्या हेतु। ऐसे पन्नों के संस्कृत में लिखे भाग में उसकी भाषा का उल्लेख lang='sa' जोड़ कर किया जा सकता है। इससे उपकरण को यह ज्ञात हो जायेगा कि मात्र यह लेख ही संस्कृत भाषा में है, अन्य नहीं। इससे मात्र उन क्षेत्र का लिप्यन्तरण होगा जो संस्कृत भाषा में हैं।

४) पृष्ठ में यूटीएफ-८ समर्थन : वेबसाइट के आम हेडर में मात्र यह यूटीएफ जोड़ देने से सारे पन्ने जो इस हेडर का प्रयोग करते हैं, उनमें इसका समर्थन आ जाएगा। सर्वप्रथम इस एचटीएमएल पृष्ठ को UTF-8 का समर्थन करना चाहिए। इसके लिए <html> के <head> में <meta http-equiv="Content-Type" content="text/html; charset=UTF-8"> जोड़ दें।

५) शीर्षक का लिप्यन्तरण : अगर पृष्ठ के शीर्षक का लिप्यन्तरण नहीं चाहिए तो notitle का चयन करें।

६) संस्कृत की प्राथमिक लिपि : वेबसाइट या पन्ने की प्राथमिक लिपि पहले से ही निश्चित कर लें, इसके लिए उपयुक्त भाषा का चयन करें।

७) अन्य भारतीय भाषाओं में बनी वेबसाइट : भारत में लगभग सभी भारतीय भाषाओं पर अंतर्जाल पर बहुत सामग्री है, लोग कई ब्लॉग भी लिखते हैं। इनमें सामान्यतः संस्कृत का कोई पाठ नहीं होता, पर कई बार मूल लिपि पढ़ना भी सुविधाजनक नहीं होता। जैसे, मेरे कई मित्र ऐसे हैं जो हिन्दी समझ तो लेते हैं पर बोलने और पढ़ने में थोड़ी कठनाई होती है। अतः इनके लिए हिन्दी पाठ को कन्नड़ या तेलुगू में लिप्यन्तरित करके पढ़ा जाए तो उनके लिए भी आसान होगा। अतः सामान्य वेबसाइट भी विशेषकर ब्लौग समुदाय  इसका लाभ उठा सकते हैं।

संस्कृत लिप्यन्तरण
सार्वभौमिक और स्वचालित (भाग-१)
उपकरण रूपरेखा (भाग-२)
विकि विशेष (भाग-३)
तकनीकि विवरण (भाग-४)
संस्कृत वेबसाइट एकीकरण (भाग-५)
भारतीय भाषा अंतः लिप्यन्तरण परियोजना (भाग ६)
उपकरण उत्थान संबंधी सुझाव (भाग-७)

संस्कृत लिप्यन्तरण : तकनीकि विवरण (भाग-४)

संस्कृत लिप्यन्तरण के इस भाग में लिप्यन्तरक उपकरण पर चर्चा की गई है। इससे रूचिकर मित्र सीधे इसमें बदलाव या उत्थान के लिए सुझाव दे सकते हैं। इसकी विस्तारित चर्चा भारतीय भाषा अंतः लिप्यन्तरण : लिप्यन्तरक रूपरेखा पर भी की गयी है।

१) भारतीय भाषा सूची : मुख्य पन्ने पर एक सेलेक्ट मेनू लगाया जाता है जिसमें समस्त ९ भारतीय लिपियों की सूची हो - हिन्दी, बंगाली, पंजाबी, गुजराती, ओड़िआ, तमिल, तेलुगू, कन्नड़, मलयालम। इसी मेनू में से जिस भाषा का चयन होगा, उसमें देवनागरी में लिखे लेख का लिप्यन्तरण किया जाएगा।

२) अंतःभाषा लिप्यन्तरण मूल सामग्री : एक array जिसमें एक भाषा से दूसरे भाषा में लिप्यन्तरण की मूल जानकारी निहित हो।

  • इसमें मूल भाषा की प्रारंभिक यूनीकोड सँख्या, गंतव्य भाषाओं की सूची, और प्रत्येक गंतव्य भाषा के प्रारंभिक यूनीकोड सँख्या से अंतर सहेजे गए हैं।


३) वर्णमेल (चिन्ह, स्वर) : इसमें एक भाषा के वर्ण को दूसरे भाषा के वर्ण से मेल कराया जाता है। अगर दोनों भाषा में वर्ण के यूनीकोड मेल खाते हों, अर्थात् प्रारंभिक यूनीकोड सँख्या से समान दूरी पर हों, तो उसमें भाषा के अंतर को जोड़ कर नया वर्ण निकाल लिया जाता है।

  • अगर दोनों भाषा में वर्ण के यूनीकोड मेल नहीं खाते हों, तो सही वर्ण की माप का निर्माण आवश्यक है। इसके लिए संबंधित भाषा के संस्कृतज्ञाता से संपर्क स्थापित कर इन अशुद्धियों को दूर किया जा सकता है। ४. पृष्ठ के title का लिप्यन्तरण।

५) एचटीएमएल टैग : पृष्ठ के प्रत्येक tag  का लिप्यन्तरण : attribute और textnode

  • प्रत्येक tag के लिए जो दृष्चित attribute हैं उनकी सूची और जिनमें textnode आता है उनकी सूची। ६. अगर लिप्यन्तरण दो भाषाओं में हो जिसमें एक भी देवनागरी नहीं है, तो पहले प्राथमिक भाषा के लेख को देवनागरी में और उस देवनागरी लेख को गंतव्य भाषा में लिप्यन्तरित किया जाएगा। ऐसा अशुद्धियों को कम करने के लिए किया गया है।

६) बूलेट सूची : बूलेट में आने वाली सँख्या को भारतीय लिपि के रूप में दर्शाने के लिए अभी नए ब्राउजर्स में समर्थन आ रहा है। इसे बदलने के लिए -moz-devanagari, -moz-bengali, -moz-gurmukhi, -moz-gujarati, -moz-oriya, -moz-tamil, -moz-telugu, -moz-kannada, -moz-malayalam का प्रयोग कर सकते हैं।

७) कूकी : कूकी में चयनित भाषा का संरक्षम, पूर्ण वेबसाइट के लिए, अगले ३० दिन के लिए।


संस्कृत लिप्यन्तरण
सार्वभौमिक और स्वचालित (भाग-१)
उपकरण रूपरेखा (भाग-२)
विकि विशेष (भाग-३)
तकनीकि विवरण (भाग-४)
संस्कृत वेबसाइट एकीकरण (भाग-५)
भारतीय भाषा अंतः लिप्यन्तरण परियोजना (भाग ६)
उपकरण उत्थान संबंधी सुझाव (भाग-७)

संस्कृत लिप्यन्तरण : विकि विशेष (भाग-३)

संस्कृत लिप्यन्तरण - सार्वभौमिक और स्वचालित (भाग-१) में जैसा मैंने लिखा, संस्कृत विकि में संस्कृत के लिप्यन्तरण  उपकरण का सर्वाधिक महत्व है। विकि पर हम पढ़ सकते हैं, लिख सकते हैं और वर्तमान लेखों में संशोधन भी कर सकते हैं। इसके लेख सामान्य पाठकों द्वारा ही लिखे जाते हैं, विषयविशेषज्ञ द्वारा नहीं। अतः यह और भी आवश्यक हो जाता है कि संस्कृत विकि पर अधिक से अधिक संस्कृतभाषियों का योगदान हो, जिससे इस प्राचीन भाषा सतत् विकास हो।

पाठन
विकि पर सामान्य जानाकारी प्राप्त करना सबसे आम बात है। हमें किसी श्लोक या किसी ग्रन्थ की मूल जानकारी लेनी हो तो विकि पर जाकर इसका पाठन करते हैं। परन्तु अगर यह पाठ मात्र देवनागरी में लिखी हो, तो पाठक समुदाय सीमीत हो जाता है। अतः इस पाठ को अन्य लिपियों में दर्शाने की आवश्यकता है।

विकि के किसी लेख के सामान्यतः पाँच भाग होते हैं : (१) बाएँ ऊपरी भाग में विकि की मूल कड़ियाँ, (२) बाएँ नीचले भाग में अन्य भाषा संबंधी लेख (३) ऊपरी भाग में पाठन, संशोधन और चर्चा संबंधी कड़ियाँ (४) लेख शीर्षक (५) पूर्ण लेख जिसमें वर्ण, चिन्ह, स्वर और सँख्या सम्मिलित हैं।

पाठक के लिए भाग (२) छोड़कर लगभग सारे भाग महत्वपूर्ण हैं। बिना मूल कड़ियों के विकि के बारे में जानने मे कठिनाई होगी, मूल पाठन, संशोधन और चर्चा अच्छी लेख लिखने के लिए आवश्यक है और लेख का नाम व उसके ऊपर लिखी लेख को पढना ही पाठक का औचित्य।

लेख को किसी भी भाषा में पढ़ने के लिए उस भाषाओं की सूची बनाई जा सकती है और विकि के दाईंपट पर लगाई जा सकती है। पाठक अपनी ईच्छानुसार भाषा को चुनकर लेख पढ़ सकते हैं।

नए लेख लिखना और संशोधन
नए पाठ मुख्यतः देवनागरी में ही बनने चाहिए। परन्तु अगर पाठक देवनागरी से अनभिज्ञ हो, तो उसे अपनी भाषा में लिखने की सुविधा भी होना चाहिए। इसमें किसी भी भाषा से देवनागरी में रूपांतरण को उपयोग में लाया जा सकता है। किसी एक भाषा में लिखने के लिए उसे भाषाओं की सूची से चयन किया जा सकता है।

वर्तमान लेख का संशोधन करने के लिए भी देवनागरी का ही प्रमुख रूप से प्रयोग होना चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि लेख किसी भी रूप में पढ़ा जाए या लिखा जाए, वह विकि पर देवनागरी रूप में ही सहेजा जाना चाहिए। इससे पाठ में अशुद्धियाँ कम होती हैं और एकरूपता बनी रहती है।

जबकि नए लेख को एक बार लिप्यन्तरण संबंधी अशुद्धियाँ दूर करने के लिए जाँचा जा सकता है, अन्य भाषा में संशोधन की जाँच करना थोड़ा कठिन है, पर असंभव नहीं। अगर विकि मित्र हाल ही मे हुए परिवर्तनों की अच्छे से जाँच करते रहें, तो अवश्य ही इन संशोधन में हुई त्रुटी को भी दूर किया जा सकता है।

लेख खोजना
विकि पर वांछित लेख खोजना भी एक महत्वपूर्ण क्रिया है। क्योंकि लेख देवनागरी में लिखे हैं, लेख तो देवनागरी में ही खोजने पड़ेंगे। अगर अन्य भाषा में लिखे शब्द को देवनागरी में रूपांतरित करके खोजा जाए, तो पाठक अन्य लेखों को खोज भी सकते हैं।

वरीयता से एकरूपता और सहजता
पाठक अगर किसी भाषा में ही पढ़ना और लिखना चाहते हों तो उनकी पसंद को वरीयता सूची में जोड़ा जा सकता है। इसमें सभी भाषा की सूची दी जा सकती है जिसमें लिप्यन्तरण संभव है। इससे पाठन के लिए और संशोधन के लिए अलग से भाषा चयन सूची देने की भी आवश्यकता नहीं रहेगी।

संशोधन में इस वरीयता का लाभ उठाया जा सकता है। चयनित भाषा के अनुसार ही संपादक को विशेष वर्णमाला दी जा सकती है, जिससे लेख में क्षेत्रिय वर्ण, स्वर या चिन्ह कम से कम आएँ और लेख को देवनागरी में परिवर्तित करने में अशुद्धियाँ कम हों। अगर भाषा विशेष ज्ञात अशुद्धियाँ हैं तो उसे संपादक को पहले से ही बताया जा सकता है, जिससे वह लेख में कम से कम त्रुटियाँ करे।

इसी विषय पर विकि के बगजिला पर कुछ टिपण्णियाँ भी की गई हैं, Automatic script conversion in Sanskrit language

संस्कृत लिप्यन्तरण
सार्वभौमिक और स्वचालित (भाग-१)
उपकरण रूपरेखा (भाग-२)
विकि विशेष (भाग-३)
तकनीकि विवरण (भाग-४)
संस्कृत वेबसाइट एकीकरण (भाग-५)
भारतीय भाषा अंतः लिप्यन्तरण परियोजना (भाग ६)
उपकरण उत्थान संबंधी सुझाव (भाग-७)

संस्कृत लिप्यन्तरण : उपकरण रूपरेखा (भाग-२)

संस्कृत लिप्यन्तरण - सार्वभौमिक और स्वचालित (भाग-१) में संस्कृत भाषा के लिए लिप्यन्तरक की आवश्यकता पर मैंने प्रकाश डाला है। अतः इस लिप्यन्तरक की संरचना पर चर्चा करें। यह लिप्यन्तरक कैसा होना चाहिए, कैसे यह किसी लेख को एक भाषा से दूसरे भाषा में लिप्यन्तरित कर सकेगा, कैसे विद्यमान वेबसाइट और नई वेबसाइट सहजता से इसका प्रयोग कर सकेंगे, जैसे कई प्रश्न हैं जिसका उचित हल निकालना आवश्यक है।

लिप्यन्तरक की आधार भाषा
देवनागरी को आधार मानते हुए इस लिप्यन्तरक का निर्माण किया गया है, रोमनी रूप से नहीं। ऐसा इसलिए क्योंकि (१) रोमनी वर्णमाला संस्कृत के सिद्ध उच्चारणों लिए सीमीत है, (२) देवनागरी की वर्णमाला में संस्कृत के लगभग सभी उच्चारण स्वर आ जाते हैं, (३) यूनीकोड में, जिसके माध्यम से विश्व की सभी लिपियों को वेबसाइट पर समान्यतः दर्शाया जाता है, और भारत सरकार की इन्स्कृप्ट ने देवनागरी को आधार मानते हुए ही समस्त भारतीय लिपियों का निर्माण किया गया है और (४) देवनागरी ही संस्कृत का सर्वाधिक प्रयुक्त और प्रचलित रूप है।

यूनीकोड (unicode.org) पर सभी भारतीय भाषाओं को एक समान स्वरूप देने का प्रयास किया गया है। उदहारण के लिए, कन्नड़ और मलयालम का 'क' और देवनागरी लिपि का 'क' अपने प्रारंभिक वर्ण से एक समान दूरी पर हैं। विभिन्न भारतीय भाषाओं की वर्णमाला की इस समानता और इनके समान यूनीकोड संरचना से लिप्यन्तरण का काम सरल हो जाता है।

लिप्यन्तरक की मूल तकनीक
इसके लिए जावास्कृप्ट का प्रयोग किया जा सकता है। इसके कई फायदे हैं (१) इसे वर्तमान पृष्ठों में आसानी से जोड़ा या हटाया जा सकता है (२) सर्वर के सुरक्षित क्षेत्र से कोई छेड़-छाड़ की संभावना कम हो जाती है और वेबसाइट की सुरक्षा बनी रहती है, और (३)उपकरण में हुए भावी अद्यतन का इससे स्वतः ही सम्मेलन हो जाता है।

क्या पृष्ठ पर सब कुछ लिप्यन्तरित करें?
पृष्ठ के जितने भी संस्कृत में लेख हैं, उनका ही लिप्यन्तरण होना चाहिए। इसमें पन्ने का शीर्षक, किसी भी कड़ी या अन्य एचटीएमएल भाग का शीर्षक और उनमें निहित लेख शामिल हैं।किसी पृष्ठ में मात्र संस्कृत लेख होना भी आवश्यक नहीं। एक श्लोक की व्याख्या के लिए सरल भाषाओं का प्रयोग किया जा सकता है। अतः यह भी आवश्यक है कि मात्र संस्कृत भाषा में लिखे भाग को ही लिप्यन्तरित किया जाये।

लिप्यन्तरक का स्वरूप
लिप्यन्तरण के लिए सभी भारतीय भाषाओं की एक सूची बनाई जा सकती है, जो पृष्ठ के ऊपरी दाएँ कोने या अन्य सहज स्थान पर लगाई जा सकती है। जब एक भाषा का चयन होता है, तो पृष्ठ को भाषा में प्रदर्शित किया जाता है। लिप्यन्तरित पृष्ठ में अगर नई भाषा का चयन किया जाता है, तो उत्तम यही होगा कि पुनः देवनागरी में लिखे लेख को नई भाषा में लिप्यन्तरित किया जाये। इससे लिप्यन्तरण में आई त्रुटियों को कम किया जा सकता है।

एक ही वेबसाइट पर एक पन्ने से दूसरे पन्ने में जाने के लिए निरंतर नई भाषा के चयन की आवश्यकता नहीं पड़नी चाहिए। पाठक की वरीयता को एक कूकी में सहेज कर उस वेबसाइट के सभी पन्नों को पाठक की पसंदीदा भाषा में दिखाया जा सकता है।

सरल लिप्यन्तरण
यह उपकरण संस्कृत के देवनागरी रूप को अन्य भाषा में लिप्यन्तरित करता है। किसी भी भाषा से दूसरे भाषा में सिद्धांतः लिप्यन्तरण हो सकता है, परन्तु इससे त्रुटियों के आने की संभावना रहती है। जहाँ देवनागरी को शुद्ध रखने की कोशिश की गई है, अन्य भाषाओं पर क्षेत्रिय प्रभाव अधिक होता है, अतः लिप्यन्तरण में अशुद्धी आ सकती हैं। उदाहरणतः, बंगाली में 'व' का उच्चारण 'ब' की तरह ही किया जाता है, अतः अगर बंगाली संस्कृत को देवनागरी में परिवर्तित करें तो यह जानना कठिन है कि 'ब' को 'ब' ही रहने दें या 'व' में लिप्यन्तरित करें।

पूर्ण लिप्यन्तरण
सिद्धांतः संस्कृत का लिप्यन्तरण किसी भी एक भाषा से दूसरे भाषा में किया जाना चाहिए। इसे सामान्य वर्ण, स्वर और चिन्हों के मेल से ऐसे बनाया जा सकता है जिससे अशुद्धियाँ कम से कम हो। इस कार्य में क्षेत्रिय प्रभावों पर विशेष ध्यान देते हुए उपकरण का निर्माण किया जा सकता है।

इसे अधिक सरल बनाने के लिए देवनागरी को मध्य आधार बनाया जा सकता है। उदहारणतः संस्कृत के कन्नड़ रूप को तेलुगु रूप में लिप्यन्तरित करने के लिए दो बार लिप्यन्तरण का प्रयोग किया जा सकता है, पहले कन्नड़ को देवनागरी और फिर देवनागरी को तेलुगु में लिप्यन्तरित करके। अतः दो स्थानीय भाषा के आपसी लिप्यन्तरण के लिए देवनागरी को आधार बनाया जा सकता है। हालाँकि कुछ भाषाएँ आपस में संबंधित हैं, जैसे बंगाली और अमामी या कन्नड़ और तेलुगु, और उनका आपसी लिप्यन्तरण अधिक सरल होना चाहिए, देवनागरी को आधार बनाने से लिप्यन्तरक का सार्वभौम रूप और शुद्धता दोनों बनी रहती है।

देवनागरी और अन्य भाषा के लिप्यन्तरण अशुद्धियों को ध्यान में रखने से कुल अशुद्धियाँ कम हो जाती हैं। इससे प्रत्येक भाषा के आपसी अशुद्धियों पर ध्यान देने की भी आवश्यकता नहीं पड़ती।

यहाँ भी देखें, भारतीय भाषा अंतः लिप्यन्तरण : लिप्यन्तरक रूपरेखा

संस्कृत लिप्यन्तरण
सार्वभौमिक और स्वचालित (भाग-१)
उपकरण रूपरेखा (भाग-२)
विकि विशेष (भाग-३)
तकनीकि विवरण (भाग-४)
संस्कृत वेबसाइट एकीकरण (भाग-५)
भारतीय भाषा अंतः लिप्यन्तरण परियोजना (भाग ६)
उपकरण उत्थान संबंधी सुझाव (भाग-७)

संस्कृत लिप्यन्तरण - सार्वभौमिक और स्वचालित (भाग-१)

संस्कृत भाषा का लिप्यन्तरण
संस्कृत भारतीय पुराण व स्मृति की भाषा है। सदियों से बोली जाने वाली यह भाषा आज भी पूजा-पाठ और कर्मकांड में उपयोग में आती है। एक महत्वपूर्ण बात संस्कृत की यह है कि भारत की अधिकांश भाषाओं के विकास में इसका विशेष योगदान रहा है। अतः संस्कृत को हर भाषा की लिपि में लिखा जाता है। यद्यपि संस्कृत की मुख्य लिपि देवनागरी है, यह स्थानीय लिपि में भी लिखी जाती है। उदाहरणतः बिहार और उत्तरप्रदेश में संस्कृत देवनागरी में लिखि जाती है, वहीं कर्नाटक में कन्नड़ और पश्चिम बंगाल में बंगाली, आंध्र प्रदेश में तेलुगु में लिखी जाती है।

इंटरनेट की लोकप्रियता बढ़ने से संस्कृत भाषा के प्रचार को भी बल मिला है।("Sanskrit" search on Google returns 97m+ results, गूगल पर "संस्कृत" खोजने से २५लाख से भी अधिक परिणाम मिले) । श्लोक, ग्रन्थ और पुराण संबंधी कई वेबसाइट इसपर है जिन्हें लोग चाव से पढ़ते हैं। इनमें से कई तो अंग्रेजी भाषा में ही हैं, कई पर संस्कृत का रोमनीकरण किया गया है। मेरे ऑफिस में कुछ संस्कृत प्रेमी संस्कृत सिखाते भी हैं और इसमें निहित ज्ञान का आदान-प्रदान भी करते हैं।

रोमन रूप
संस्कृत का रोमनी रूप कभी भी पूर्ण नहीं रहा (History of Sanskrit Transliteration), क्योंकि इसकी उच्चारण पद्धति विस्तारित है जबकि रोमन रूप सीमीत। इसलिए शुद्धता के लिए संस्कृत को स्थानीय लिपि में ही लिखा जाना चाहिए, ताकि इसमें उच्चारण-संबंधी त्रुटियाँ कम से कम आये। यही नहीं, विभिन्न भाषियों में एक जैसे बोले जाने के कारण और इसके सुदृढ़ स्वरूप से इसका लिप्यन्तरण एक लिपि से दूसरे लिपि में भी किया जा सकता है। लिप्यन्तरण के माध्यम से एक लेख को सुनने के तरीके से दूसरी लिपि में लिखा जाता है। रोमन लिपि के माध्यम से भारतीय भाषा के लेख में इसका प्रयोग आज सहज है, पर उतना शुद्ध नहीं।

संस्कृत की पुस्तकें हर भाषा में मिलती हैं, और उन्हें संस्कृत के नाम से ही जाना जाता है। ये पुस्तकें अनुवादित नहीं, बस उस भाषा की लिपि में लिप्यन्तरित है। किसी पुस्तक का स्वचालित लिप्यन्तरण तो संभव नहीं, पर इंटरनेट पर पड़े संस्कृत में लिखे पन्नों को इस माध्यम से अन्य भारतीय भाषा में सुलभ ही दर्शाया जा सकता है।  इसकी सहायता से संस्कृत को किसी भी लिपि में लिखा जा सकता है और उसमें दर्शाया जा सकता है। अर्थात् आप एक भाषा में लिखें, दूसरे में पढ़ें और तीसरे में संशोधन।

संस्कृत विकि
इसका एक महत्वपूर्ण उदारण संस्कृत विकिपीडिया है। इसकी लिपि तो देवनागरी है, परन्तु इसे कन्नड़ या ओड़िआ में लिखने की कोई सुविधा नहीं है। फलस्वरूप देवनागरी की जानकारी रखने वाले भारतीय ही इस संस्कृत ज्ञान का लाभ उठा पा रहे हैं। बस इतना ही नहीं, देवनागरी से अनभिज्ञ भारतीय इसपर योगदान करने से वंचित हो जाते हैं, जैसे नए लेख बनाना या पुराने लेख में संशोधन करना। इससे संस्कृतभाषियों का एक बड़ा समूह ज्ञान के इस धरोहर से जुड़़ा नहीं है।

मात्र विकि ही क्यों, संस्कृत श्लोकों पर, संस्कृत पुस्तकों पर, गीतों पर और कई संस्कृत सीखाने वाले पन्नों को भी संस्कृत के अन्य लिपियों में दिखाने की आवश्यकता है। लिप्यन्तरण की सहायता से हमें हर भाषा के लिए नए लेख लिखने या बनाने की आवश्यकता नहीं पड़ती, बस मनचाही भाषा में उसे देख सकते हैं, पढ़ सकते हैं, ज्ञान की प्राप्ति कर सकते हैं, उसे साझा कर सकते हैं, इत्यादि।

शायद ही कोई और भाषा होगी इस विश्व में, जिसे समझने और इसके विकास में सहायता सहभागी बनने के लिए मात्र लिप्यन्तरण की आवश्यकता हो, ना कि अनुवाद की।

संस्कृत लिप्यन्तरण
सार्वभौमिक और स्वचालित (भाग-१)
उपकरण रूपरेखा (भाग-२)
विकि विशेष (भाग-३)
तकनीकि विवरण (भाग-४)
संस्कृत वेबसाइट एकीकरण (भाग-५)
भारतीय भाषा अंतः लिप्यन्तरण परियोजना (भाग ६) 
उपकरण उत्थान संबंधी सुझाव (भाग-७)

अनूसूचित जाति-जनजाति हेतु आरक्षण

आरक्षण एक विवादास्पद विषय है। पिछले 3-4 दशकों में यह भारत की राजनीति का अहम् हिस्सा भी है। पिछले दो दशकों में कई पार्टियों ने (केन्द्र और राज्य दोनों में) तो मात्र आरक्षण को मुद्दा बनाकर चुनाव जीता है और सरकार बनाई है। इसमें लालू जी की बिहार में सरकार, 90 की वी.पी. सिन्ह की केन्द्र सरकार और कौन्ग्रेस की केन्द्र व राज्य सरकारें (जैसे आन्ध्रप्रदेश) शामिल हैं। बिहार में नीतीश जी ने विधायिका में आरक्षण को स्वीकृति दी है (यह संसद और लगभग सारे राज्यों में लागू है, पढिए द्वितीय अध्याय, नीतीश कुमार : विकसित बिहार की खोज) । और तो और, अगले महीने हो रहे उत्तरप्रदेश व अन्य राज्यों के चुनाव को देखते हुए कौन्ग्रेस की केन्द्र सरकार ने खास मुसलमानों व अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण का प्रस्ताव रखा है। इसमें 4.5% तक के आरक्षण का प्रावधान है, जिसमें केन्द्र सरकार के सारे विभाग व सैकड़ों पीएसयू शामिल हैं।

आरक्षण का ज्ञान सबसे पहले मुझे 12वीं कक्षा पास करते समय हुआ, जब हम सब आईआईटी-जेईई में पास होने के लिए जी-तोड़ मेहनत कर रहे थे। जब परिणाम आया तो देखा कुछ तेज मित्र पिछे छूट गए और कुछ कमजोर मित्र आगे भी निकल गए। जब आईआईटी पहुँचे तो माहौल कुछ अगल ही था। लगभग एक चौथाई बच्चे ऐसे थे जो कम सँख्या पर भी अच्छे विभाग में थे, अर्थात् जो आरक्षण से आए थे। हालाँकि यह चर्चा का विषय था, पर बच्चों के बीच में रोष जैसा कुछ नहीं था। शायद यह रोष उनके बीच होता जिनको कोई भी सीट ना मिल पाई हो भारत के सबसे ईकाई के इस प्रौद्यौगिकी संस्थान में।

नीतीश कुमार : विकसित बिहार की खोज और महादलित वर्ग

श्री नीतीश कुमार के चर्चे चारों तरफ हैं। क्यों न हो? बिहार और बिहारी के कायापलट में उनका प्रखण्ड योगदान रहा है। नए-नए तरीकों से उन्होंने राज्य को सुधारा और विकास की राह पर चलाया, कई मायनों में उन्हें देश का सबसे अच्छा मुख्यमंत्री भी माना जाता है।

बिहार का घटनाक्रम हमें आए-दिन समाचार से प्राप्त हो ही जाता है। पर नीतीश कुमार जैसे आकर्षक व्यक्तित्व, उनके नेतृत्व और विचारों का संकलन मिलना थोड़ा दुर्लभ है। जब मैंने उनके द्वारा या उनके ऊपर लिखी पुस्तकों को खोजा, तो मात्र दो पुस्तकें मिली। एक तो नई-नई आई है अरूण सिन्हा की लिखी हुई, नीतीश कुमार एंड राइज ऑफ बिहार, अंग्रेजी भाषा में है और थोड़ी लम्बी भी है, महंगी भी। 1975 की आपातकालीन घोषणा से लेकर अब तक की चर्चा है इस पुस्तक में, जैसे नीतीश कुमार की राजनीतिक लड़ाई, लालू यादव का ऊदय और पतन, और अंततः नीतीश कुमार की जीत, उनका प्रशासन तथा अन्य जुड़ी हुईं बातें। दूसरी पुस्तक जो एक मायने में स्वयं नीतीश कुमार ने ही लिखी है, विकसित बिहार की खोज। इस पुस्तक को नरेन्द्र पाठक ने संपादित किया है, क्योंकि यह कोई आत्मकथा नहीं बल्कि बिहार विधानसभा में नीतीश कुमार द्वारा दी गई 51 भाषणों का संग्रह है। इसकी भूमिका पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने लिखी है। मन तो दोनों पुस्तक पर हाथ मारने का है पर पहले किसपर? मैंने शुरूआत की नीतीश जी के काम को जानने से, और खरीदी उन 51 भाषणों की पोथी!