नीतीश कुमार : विकसित बिहार की खोज और महादलित वर्ग

श्री नीतीश कुमार के चर्चे चारों तरफ हैं। क्यों न हो? बिहार और बिहारी के कायापलट में उनका प्रखण्ड योगदान रहा है। नए-नए तरीकों से उन्होंने राज्य को सुधारा और विकास की राह पर चलाया, कई मायनों में उन्हें देश का सबसे अच्छा मुख्यमंत्री भी माना जाता है।

बिहार का घटनाक्रम हमें आए-दिन समाचार से प्राप्त हो ही जाता है। पर नीतीश कुमार जैसे आकर्षक व्यक्तित्व, उनके नेतृत्व और विचारों का संकलन मिलना थोड़ा दुर्लभ है। जब मैंने उनके द्वारा या उनके ऊपर लिखी पुस्तकों को खोजा, तो मात्र दो पुस्तकें मिली। एक तो नई-नई आई है अरूण सिन्हा की लिखी हुई, नीतीश कुमार एंड राइज ऑफ बिहार, अंग्रेजी भाषा में है और थोड़ी लम्बी भी है, महंगी भी। 1975 की आपातकालीन घोषणा से लेकर अब तक की चर्चा है इस पुस्तक में, जैसे नीतीश कुमार की राजनीतिक लड़ाई, लालू यादव का ऊदय और पतन, और अंततः नीतीश कुमार की जीत, उनका प्रशासन तथा अन्य जुड़ी हुईं बातें। दूसरी पुस्तक जो एक मायने में स्वयं नीतीश कुमार ने ही लिखी है, विकसित बिहार की खोज। इस पुस्तक को नरेन्द्र पाठक ने संपादित किया है, क्योंकि यह कोई आत्मकथा नहीं बल्कि बिहार विधानसभा में नीतीश कुमार द्वारा दी गई 51 भाषणों का संग्रह है। इसकी भूमिका पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने लिखी है। मन तो दोनों पुस्तक पर हाथ मारने का है पर पहले किसपर? मैंने शुरूआत की नीतीश जी के काम को जानने से, और खरीदी उन 51 भाषणों की पोथी!

पुस्तक शुरू ही होती है नीतीश कुमार जी के चहेते परियोजना और कई मायनों में एक राजनीतिक बदलाव से : महादलित। देश के मंडलीकरण के उपरान्त अग्रिम जातियों ने इसका फायदा तो उठाया, पर अल्पसंख्यक और बहुत पिछड़े जातियों पर इसका खास प्रभाव नहीं पड़ा। अनूसूचित जातियों-जनजातियों को 50 साल से आरक्षण मिलने पर भी उन्हें ज्यादा फायदा नहीं मिल पाया है। इस अंतर को नीतीश जी ने भांपा और इसपर अमल भी किया। कई आयोगों का गठन किया (जैसे महादलित आयोग और कार्मिक व प्रशासनिक सुधार आयोग), नई नीतियों को चलाया जो खासकर इस महादलित वर्ग पर लागू होती हैं। इसमें रोटी, कपड़ा, मकान से लेकर सांस्कृतिक, आर्थिक व शैक्षिक विकास और स्वास्थ्य, सड़क जैसे विषयों को भी शामिल किया।

और कहीं मुझे लगा नीतीश जी एक साथ बहुत ज्यादा करने की सोच रहे हैं। जहाँ सरकार पर आर्थिक बंधन हो और महादलित समाज की स्थिति बहुत ही खराब हो, वहाँ एक पूर्ण विकसित हँसते-खेलते समाज की अपेक्षा 5-10 सालों में करना महत्वाकांक्षी है। तत्कालीन भरण-पोषण के लिए मवेशी अधिक फायदेमंद हैं, कार्यशैली सीखने और फिर कर्मचारी का काम करने से। साथ ही ऐसी शैलियाँ जिसकी शुरूआती लागत ना के बराबर हो, जैसे मिट्टी के बर्तन बनाना, बढ़ई, नाई इत्यादि, छोटे समय में अच्छे परिणाम दे सकते हैं। हालाँकि उत्पादन वाली शैलियों पर ज्यादा जोर देना होगा बनिस्पत सेवा शैलियों से।और हाँ, सिर्फ उत्पादन से ही नहीं, लोगों को जागरूक भी करना होगा ऐसे सामान को खरीदने के लिए।

बच्चों की शैक्षिक स्थिति नीतीश जी का और हम सब का सबसे बड़ा सरदर्द है। पहले बच्चे स्कूल में नाम लिखाते नहीं, फिर आते नहीं, फिर आते-आते कहीं रह जाते हैं, कुछ देर पढते हैं और फिर कहीं मजदूरी में लग जाते हैं। आखिर इस गति से शैक्षिक उद्धार होने से तो रहा। इस आने-जाने के चक्कर को छोड़ नीतीश जी को इसका एक ठोस हल निकालना चाहिए। और मुझे लगता है इसका हल है आवासीय शिक्षा प्रणाली

जब खाने का, पढने का, कपड़े का, कॉपी का खर्चा उठा ही रहे हैं तो रहने का खर्चा तो एक बार का है। आवासीय शिक्षा के बहुत फायदे हैं, खासकर अत्यंत वंचित समाज के लिए। सबसे पहले इससे बच्चे चले जाते हैं कहीं दूर, बिल्कुल एक नए समाज में, जो अभी पनप रहा है, बाहरी प्रभावों से हट के, ऊँच-नीच से बेखबर, पारिवारिक व्यथा से अनजान। बचती है बस किल्कारी, क्रीड़ा और थोड़ी-मोड़ी पढाई। दूसरा है शिक्षा का प्रावधान। इसमें आप सिर्फ अ से आम और इ से इमली ही क्यों, सामाजिक शिक्षा दीजिए, खासकर पिछड़ी जातियों से संबंधित, उनके समाज के बारे में, उनके उत्थान/पतन के बारे में। साथ में जो कलाएँ और क्रीड़ा सीखाना है वो तो है ही।

और तीसरा और शायद सबसे मह्तवपूर्ण, बच्चों की ट्रेनिंग और अंतर्निहित उत्पादन। कला सीखना और इसी बहाने बेकार ही सही पर कुछ-कुछ बनाते जाना ही ऐसी संस्था को सक्षम बनाए रखने में मदद कर सकता है। सुबह से शाम तक बच्चों का सर पकाने से अच्छा है इन्हें कुछ मूल्यवान या मतलब की क्रिया में लगाना। यह मानना गलत नहीं होगा कि आवासीय विद्यालयों में बदमाशी की घटनाएँ जिम्मेदारियों के अभाव से भी बढ रही हैं। बस खेलने और पढने से सामर्थ और जवाबदेही नहीं आ जाती। छोटा ही सही पर ऐसा कार्य करें जिसका कोई मूल्य हो, आर्थिक नहीं तो सामाजिक ही सही, पर जिससे व्यक्तित्व का विकास तो हो। और साथ ही इसका आर्थिक स्वरूप भी बुरा नहीं है। कुछ उत्तरदायित्व वाला काम करेंगे तो उसका आर्थिक मूल्य भले ही रूपया में नही किसी सामान की आपूर्ति से भी हो जाए तो बहुत है। पुस्तक खरीदने की बजाय लिख ही डालें, कुछ खाने के सामान, खिलौने इत्यादि तो मनमुताबिक काम ही हैं।

हमें इसके लिए अगर नए पाठ्यक्रम या डीग्री की आवाश्यकता पड़े तो इसपर भी काम कर सकते हैं। इन्हें हर तरह के कलाओं से अवगत कराएँ और सीखाएँ। मिट्टी से बर्तन या खिलौने बनाना, खेत में हल जोतना या बीज बोना, फूलों की देखभाल करना, ईंट-पत्थर से घर बनाना, लकड़ी से तख्ता, कुर्सी या टेबल बनाना, पत्थरों पर शिल्पकला, कबीलों या गाँव की खास कलाएँ जो वहाँ अधिक प्रचलित हों, लोहार के काम, साधारण बिजली और इलेक्टॉनिक सामान का कार्य और कई ऐसी कलाएँ जो हमारे जीवन में उपयोगी हैं और उनका अध्ययन कम लागत पर आसान तरीकों से किया जा सकता है।

अंत में, अगर संभव हो सके तो इसमें लड़के और लड़कियों को एक ही विद्यालय में साथ-साथ पढाएँ ना कि अलग-अलग। ना सिर्फ इससे लड़कियों में पढने और आगे बढने की स्पर्धा होगी, बल्कि बालाओं के साथ आए-दिन हो रही घटनाओं पर भी ताला लगेगा।

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