अनूसूचित जाति-जनजाति हेतु आरक्षण

आरक्षण एक विवादास्पद विषय है। पिछले 3-4 दशकों में यह भारत की राजनीति का अहम् हिस्सा भी है। पिछले दो दशकों में कई पार्टियों ने (केन्द्र और राज्य दोनों में) तो मात्र आरक्षण को मुद्दा बनाकर चुनाव जीता है और सरकार बनाई है। इसमें लालू जी की बिहार में सरकार, 90 की वी.पी. सिन्ह की केन्द्र सरकार और कौन्ग्रेस की केन्द्र व राज्य सरकारें (जैसे आन्ध्रप्रदेश) शामिल हैं। बिहार में नीतीश जी ने विधायिका में आरक्षण को स्वीकृति दी है (यह संसद और लगभग सारे राज्यों में लागू है, पढिए द्वितीय अध्याय, नीतीश कुमार : विकसित बिहार की खोज) । और तो और, अगले महीने हो रहे उत्तरप्रदेश व अन्य राज्यों के चुनाव को देखते हुए कौन्ग्रेस की केन्द्र सरकार ने खास मुसलमानों व अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण का प्रस्ताव रखा है। इसमें 4.5% तक के आरक्षण का प्रावधान है, जिसमें केन्द्र सरकार के सारे विभाग व सैकड़ों पीएसयू शामिल हैं।

आरक्षण का ज्ञान सबसे पहले मुझे 12वीं कक्षा पास करते समय हुआ, जब हम सब आईआईटी-जेईई में पास होने के लिए जी-तोड़ मेहनत कर रहे थे। जब परिणाम आया तो देखा कुछ तेज मित्र पिछे छूट गए और कुछ कमजोर मित्र आगे भी निकल गए। जब आईआईटी पहुँचे तो माहौल कुछ अगल ही था। लगभग एक चौथाई बच्चे ऐसे थे जो कम सँख्या पर भी अच्छे विभाग में थे, अर्थात् जो आरक्षण से आए थे। हालाँकि यह चर्चा का विषय था, पर बच्चों के बीच में रोष जैसा कुछ नहीं था। शायद यह रोष उनके बीच होता जिनको कोई भी सीट ना मिल पाई हो भारत के सबसे ईकाई के इस प्रौद्यौगिकी संस्थान में।

भारत में आए-दिन आरक्षण को लेकर आन्दोलन होते हैं। कई वर्ग जी-तोड़ के आरक्षण के लिए हल्ला करते हैं, और कुछ आरक्षण को हटाने के लिए बलिदान भी हो जाते हैं। अम्बेडकर जी के संविधान में आरक्षण का मुख्य कारण था शोषण। पर जैसे पिछड़े जाति वर्ग की राजनीति ने जोड़ पकड़ा, इसका राजनीतिकरण शुरू हुआ। इसका पहला शिलान्यास होता है मंडल आयोग से। फिर फिर धीरे-धीरे इसमें गरीबी, धार्मिक अल्पसंख्य्कता, क्षेत्रियता जैसे मुद्दे भी जुड़ गए।

शोषण बहुत बड़ा शब्द है और इसके कई अर्थ हो सकते हैं। एक शिक्षक किसी बच्चे को शोषित करता है जब वह उसको परिक्षा में कम सँख्या देता है क्योंकि वह उसका चहेता नहीं। एक पोलियोग्रसित शोषित होता है जब उसे इसलिए काम नहीं दिया जाता क्योंकि वह तेज चल-फिर नहीं सकता। एक लड़की शोषित होती है जब उसके माता-पिता उसे पढने विद्यालय इसलिए नहीं भेजते, क्योंकि उसे एक दिन पराई हो जाना है। इसी प्रकार अमीरों द्वारा गरीबों का शोषण, धार्मिक बहुसँख्यकों द्वारा धार्मिक अल्पसँख्यकों का शोषण, पूर्वोत्तर राज्य के नागरिकों के खिलाफ क्षेत्रियता का पक्षपात और सबसे प्रचलित जो है जातीय शोषण : उच्च जाति का नीचली जाति पर शोषण।

अम्बेड्कर जी आरक्षण के लिए किस तरह के शोषण की बात करते हैं? या फिर, अगर एक बार हम संविधान की अवज्ञा भी करें, तो किस तरह के शोषण के लिए हमारे संविधान में आरक्षण अनिवार्य होना चाहिए?

सामाजिक शोषण के लिए हमें इतिहास के पन्ने पलटने की आवश्यकता नहीं है। पिछड़े वर्ग को ऊँचे वर्ग वाले हीन दृष्टि से देखते हैं, चाहे आर्थिक रूप से वह अधिक प्रबल हों। परन्तु इसमें अनूसूचित जाति-जनजाति वर्ग का स्थान कुछ अलग है। इन्हें सिर्फ नीची दृष्टि से देखा ही नहीं गया, बल्कि एक तरह से समाज निकाला ही कर दिया गया। इनके साथ उठना बैठना तो दूर, अन्य जाति वर्ग के क्षेत्र में इनका प्रवेश भी वर्जित था। हालाँकि समाज में ऊँच-नीच कई कारणों से बन ही जाती है, पर इस तरह का कटाव तो इस वर्ग के लिए आत्मघाति है, संविधान को जिसके रचयिता अम्बेडकर जी स्वयं पिछड़े वर्ग से थे, इनके लिए कुछ करना था। कुछ ऐसा जो घर-घर जाकर जात-पात को मिटाने संबंधी शिक्षा देने से बढकर हो, जो समाज सुधारकों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता, जिसे हम घूस देकर भी नहीं खरीद सकते और जो पूरे भारत देश में एक-समान लागू हो। अम्बेडकर जी देश को बिल्कुल झकझोर देना चाहते थे, और ना चाहते हुए भी उन्होंने आरक्षण का प्रावधान रखा, पर इसका स्वरूप अस्थायी रहने दिया। वह चाहते थे कि जब देशवासी पिछड़ी जातियों से मिलेंगे तो अपने-आप ही यह भेदभाव मिटने लगेगा और इस आरक्षण की आवश्यकता ही नहीं रहेगी।

परन्तु इस धीरे-धीरे घटने वाले आरक्षण ने समय के साथ और मजबूती पकड़ ली। इसे एक आवश्यकता या मदद की बजाय एक फायदे के सौदे के रूप में देखा जाने लगा। इसका राजनीतिकरण हुआ और अन्य तरह के जातीय शोषण भी इसमें जुड़ने लगे। धार्मिक शोषण का हवाला देते हुए अल्पसँख्यक भी इसमे जुड़ गए। नतीजा हम सब के सामने है। कुछ साल पहले अन्य पिछड़े वर्ग के लिए 27% का आरक्षण पारित हुआ और अभी-अभी इसमें से 4.5% का आरक्षण धार्मिक अल्पसँख्यकों के लिए कर दिया गया है।

कोई गरीबी पर, कोई धर्म पर, कोई क्षेत्रियता पर, कोई भाषा पर तो कोई लिंगता पर भी आरक्षण मांग रहा है। पर हम यह भूल रहे हैं कि इन सभी कारणों को हम मान भी लें, फिर भी यह हमें किसी संवैधानिक अधिकार से पूर्णतः वंचित नहीं करती, अंशतः भले ही करती हो। अर्थात् अगर कोई गरीबी के कारण पढ़ नहीं सकता तो पैसे कमाने के कई साधन हैं। किसी को भाषा की दिक्कत है तो वह भाषा सीख ले, या फिर ऐसा काम करे जिसमे भाषा की दिक्कत कम हो। किसी का धर्म किसी को पसंद नहीं तो वह अपने धर्मवासियों के बीच काम करे या कहीं और काम कर ले। अगर एक जगह नारी का शोषण होता है तो वह कहीं दूसरी जगह नौकरी ढूँढे जहाँ स्त्रियों का उचित सम्मान हो। और अगर कुछ भी बात ना बने तो न्याय का द्वार खटखटाए। ऐसा इसलिए क्योंकि हमारे देश में कोई भी वर्ग, चाहे वह क्षेत्र या जाति या धर्म या भाषा आदि के आधार पर बना हो, की इतनी बुरी स्थिति नहीं कि उसका उद्धार सामाजिक या अन्य सरकारी तरीकों से नहीं हो सकता। या फिर उनका वर्ग इतना पिछड़ा और हनित है कि बहुत लघु या नाम के बराबर लोगों का ही उत्थान हो पाया हो या अधिकांश लोगों की संवैधानिक अधिकारों का हनन हो रहा हो। हाँ, इसमें समय लग सकता है पर सुधार हो सकता है और हो रहा है।

आरक्षण एक कड़वी दवा है, जो समाज में एक कठिन बीमारी को दूर करने के लिए हमें पिलाई गई है। हम सबकी भलाई इसी में है कि हम इस बिमारी को जल्द-से-जल्द दूर करें और इस कड़वाहट से मुक्ति पाएँ।

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