संस्कृत लिप्यन्तरण - सार्वभौमिक और स्वचालित (भाग-१)

संस्कृत भाषा का लिप्यन्तरण
संस्कृत भारतीय पुराण व स्मृति की भाषा है। सदियों से बोली जाने वाली यह भाषा आज भी पूजा-पाठ और कर्मकांड में उपयोग में आती है। एक महत्वपूर्ण बात संस्कृत की यह है कि भारत की अधिकांश भाषाओं के विकास में इसका विशेष योगदान रहा है। अतः संस्कृत को हर भाषा की लिपि में लिखा जाता है। यद्यपि संस्कृत की मुख्य लिपि देवनागरी है, यह स्थानीय लिपि में भी लिखी जाती है। उदाहरणतः बिहार और उत्तरप्रदेश में संस्कृत देवनागरी में लिखि जाती है, वहीं कर्नाटक में कन्नड़ और पश्चिम बंगाल में बंगाली, आंध्र प्रदेश में तेलुगु में लिखी जाती है।

इंटरनेट की लोकप्रियता बढ़ने से संस्कृत भाषा के प्रचार को भी बल मिला है।("Sanskrit" search on Google returns 97m+ results, गूगल पर "संस्कृत" खोजने से २५लाख से भी अधिक परिणाम मिले) । श्लोक, ग्रन्थ और पुराण संबंधी कई वेबसाइट इसपर है जिन्हें लोग चाव से पढ़ते हैं। इनमें से कई तो अंग्रेजी भाषा में ही हैं, कई पर संस्कृत का रोमनीकरण किया गया है। मेरे ऑफिस में कुछ संस्कृत प्रेमी संस्कृत सिखाते भी हैं और इसमें निहित ज्ञान का आदान-प्रदान भी करते हैं।

रोमन रूप
संस्कृत का रोमनी रूप कभी भी पूर्ण नहीं रहा (History of Sanskrit Transliteration), क्योंकि इसकी उच्चारण पद्धति विस्तारित है जबकि रोमन रूप सीमीत। इसलिए शुद्धता के लिए संस्कृत को स्थानीय लिपि में ही लिखा जाना चाहिए, ताकि इसमें उच्चारण-संबंधी त्रुटियाँ कम से कम आये। यही नहीं, विभिन्न भाषियों में एक जैसे बोले जाने के कारण और इसके सुदृढ़ स्वरूप से इसका लिप्यन्तरण एक लिपि से दूसरे लिपि में भी किया जा सकता है। लिप्यन्तरण के माध्यम से एक लेख को सुनने के तरीके से दूसरी लिपि में लिखा जाता है। रोमन लिपि के माध्यम से भारतीय भाषा के लेख में इसका प्रयोग आज सहज है, पर उतना शुद्ध नहीं।

संस्कृत की पुस्तकें हर भाषा में मिलती हैं, और उन्हें संस्कृत के नाम से ही जाना जाता है। ये पुस्तकें अनुवादित नहीं, बस उस भाषा की लिपि में लिप्यन्तरित है। किसी पुस्तक का स्वचालित लिप्यन्तरण तो संभव नहीं, पर इंटरनेट पर पड़े संस्कृत में लिखे पन्नों को इस माध्यम से अन्य भारतीय भाषा में सुलभ ही दर्शाया जा सकता है।  इसकी सहायता से संस्कृत को किसी भी लिपि में लिखा जा सकता है और उसमें दर्शाया जा सकता है। अर्थात् आप एक भाषा में लिखें, दूसरे में पढ़ें और तीसरे में संशोधन।

संस्कृत विकि
इसका एक महत्वपूर्ण उदारण संस्कृत विकिपीडिया है। इसकी लिपि तो देवनागरी है, परन्तु इसे कन्नड़ या ओड़िआ में लिखने की कोई सुविधा नहीं है। फलस्वरूप देवनागरी की जानकारी रखने वाले भारतीय ही इस संस्कृत ज्ञान का लाभ उठा पा रहे हैं। बस इतना ही नहीं, देवनागरी से अनभिज्ञ भारतीय इसपर योगदान करने से वंचित हो जाते हैं, जैसे नए लेख बनाना या पुराने लेख में संशोधन करना। इससे संस्कृतभाषियों का एक बड़ा समूह ज्ञान के इस धरोहर से जुड़़ा नहीं है।

मात्र विकि ही क्यों, संस्कृत श्लोकों पर, संस्कृत पुस्तकों पर, गीतों पर और कई संस्कृत सीखाने वाले पन्नों को भी संस्कृत के अन्य लिपियों में दिखाने की आवश्यकता है। लिप्यन्तरण की सहायता से हमें हर भाषा के लिए नए लेख लिखने या बनाने की आवश्यकता नहीं पड़ती, बस मनचाही भाषा में उसे देख सकते हैं, पढ़ सकते हैं, ज्ञान की प्राप्ति कर सकते हैं, उसे साझा कर सकते हैं, इत्यादि।

शायद ही कोई और भाषा होगी इस विश्व में, जिसे समझने और इसके विकास में सहायता सहभागी बनने के लिए मात्र लिप्यन्तरण की आवश्यकता हो, ना कि अनुवाद की।

संस्कृत लिप्यन्तरण
सार्वभौमिक और स्वचालित (भाग-१)
उपकरण रूपरेखा (भाग-२)
विकि विशेष (भाग-३)
तकनीकि विवरण (भाग-४)
संस्कृत वेबसाइट एकीकरण (भाग-५)
भारतीय भाषा अंतः लिप्यन्तरण परियोजना (भाग ६) 
उपकरण उत्थान संबंधी सुझाव (भाग-७)

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