श्रुति अनुवाद : भाषा लिप्यन्तरण से लिपिरहित बोली (भाग-१)

पिछले कुछ दिनों से मैं संस्कृत के अन्य भारतीय लिपियों में लिप्यन्तरण पर काम कर रहा हूँ। इससे मुझे संस्कृत के श्रुति रूप अर्थात् लिपिरहित रूप की जानकारी मिली, और साथ ही अन्य भाषाओं की आपसी समानता पर भी ध्यान गया। भारतीय सरकार कुछ गिने-चुने भाषाओं को संवैधानिक मह्त्व देती है, जबकि पूरे भारत में लगभग २००-३०० भाषायें हैं जिनका प्रयोग लोग प्रतिदिन करते हैं, और ना जाने कितने लुप्त भी हो गये हैं। राजनीतिक कारणों को छोड़ दें तो इन्हें भाषा का स्थान ना देने के मुख्य कारण हैं इनकी कोई विशिष्ट लिपि ना होना, अर्थात् किसी अन्य प्रमुख भाषा की लिपि का प्रयोग, या शब्दावली समान होना, या उस भाषा में लिखे काव्यों और ग्रन्थों का अभाव इत्यादि। अतः इन्हें बोली का स्थान दिया गया है।

भाषा या बोली, इसका प्रयोग आज भी लाखों लोग करते हैं। भारत में भाषा का मुख्य रूप बोली ही है। लिप्यन्तरण मात्र लिपि का रूप बदलती है, अर्थात् श्रुति रूप वही होता है, अतः लिपि के ज्ञान के बिना उसे भी नहीं पढ़ा जा सकता। अतः लिप्यन्तरण के स्थान पर अगर श्रुति-अनुवाद हो, जिसमें एक बोली के शब्दों, वाक्यों को दूसरी बोली के शब्दों,वाक्यों में परिवर्तित कर समझने में आसान बनाया जा सकता है।

भारतीय भाषा के लिये अनुवाद की वर्तमान स्थिति
१) अंग्रेजी से भारतीय भाषा में अनुवाद करने में अ) व्याकरण की परेशानी आ) शब्दों का अमेल इ) भाव का अमेल जैसी समस्यायें आती हैं।
२) लगभग सभी भारतीय भाषा का व्याकरण समान है, मूलतः संस्कृत पर आधारित।
३) कई शब्द भारतीय भाषाओं में समान या समरूप हैं, मूलतः संस्कृत के शब्द।
४) लोकोक्ति, भाव, कथा इत्यादि मिलते हैं, मूलतः इनके स्त्रोत गीता, रामायण, महाभारत जैसे ग्रन्थ हैं।

भाषा का संस्कृत रूप
माने या ना माने, भारत की भाषायें संस्कृत से बहुत मेल खाती हैं। भाषायें प्रायः क्षेत्रिय रूप में विद्यमान हैं। कई भाषाओं को तो भारत सरकार ने भाषा का स्थान भी नहीं दिया है, जैसी मेरी भाषा अंगिका। इन सभी भाषाओं के गीत, लोकोक्तियाँ, बोलने की शैली इत्यादि अलग-अलग हैं और स्थानीय रूप को सुदृढ़ करती हैं। संस्कृत के जैसे ही, लिखना और पढ़ना शिक्षा का महत्वपूर्ण अंग नहीं, बल्कि श्लोक, गीत, गुरूवाणी इत्यादि को याद रखना ही सच्ची शिक्षा के रूप में जानी गयी है। सबसे बड़ी बात, मुख्यतः हम भाषा का बोलचाल में प्रयोग करते हैं, लिखने-पढ़ने का कम।

भाषा - श्रुति रूप
भारत में बोली ही भाषा है और भाषा ही बोली है। एक समय था जब पूरे के पूरे ग्रन्थ ऋषि-मुनि याद रखते थे और अपने शिष्यों को पढ़ाते थे (लगभग ३००० वर्ष पूर्व)। अतः इस रूप का आलिङ्गन करके ही भारत की भाषाओं का लिखित रूप में विकास हो सकता है। एक ही शब्दार्थ को दूसरे भाषा में कैसे बोलें, किस तरीके से बोलें, किसी वाक्य का रूप दूसरे भाषा में उचित रूप में कैसा होगा, इत्यादि, ना ही बहुत कठिन हैं, बल्कि ये रूप लिखित रूप में भी नहीं होते। भाषा का पूर्ण रूप तो उसके बोल-चाल अर्थात् श्रुति रूप में ही निहित है।

लिखित रूप में अनुवाद
प्रायः अनुवाद से तात्पर्य किसी लेख के लिखित रूप का दूसरे भाषा में अर्थानुसार परिवर्तित करने से है। सूचना प्रौद्योगिकी में अनुवाद का तात्पर्य शब्द-बनाम्-शब्द और वाक्य-बनाम्-वाक्य हो जाता है। कारण यह कि अभी तक किसी वाक्य को समझने और उसे पुनः लिखने की क्षमता अच्छी तरह से विकसित नहीं हो पाई है। तरीका अच्छा है, पर शब्द के विकार, संधि, वाक्य रचना इत्यादि में यह चूक जाता है। अर्थात् हमें नयी भाषा में शब्दार्थ तो मिल जाते है, पर भाषा की संरचना की उपेक्षा हो जाती है, क्योंकि हम शब्दों को ढ़ूँढ़ते हैं, और उससे अर्थ निकाल लेते हैं, अतः भाषा की संरचना सही नहीं होने पर भी अनुवाद ठीक-ठाक, काम-चलाऊ हो जाता है।

श्रुति रूप का श्रुति रूप में अनुवाद
वहीं एक दूसरे तरीके में, किसी लेख के श्रुति रूप को ही दूसरे भाषा के श्रुति रूप में परिवर्तित किया जा सकता है। जैसे "मैं जाता हूँ" का अंगिका श्रुति अनुवाद "हम्मऽ जाय छियै" होगा। भारत की लगभग सभी भाषाओं की संरचना एक समान है, एक ही व्याकरण है, एक ही मूल शब्दावली है, और सबसे बड़ी बात एक जीवंत समाज है जो इन रूप को संजोये रखता है और इसका विकास तत्पर करता रहता है। श्रुति अनुवाद के कई लाभ हैं,
    १) बोलचाल में अक्सर प्रयुक्त आने वाली शब्दावली कम होती हैं
    २) एक ही तरह के शब्द और वाक्य का प्रयोग प्रायः होता है, बार-बार होता है। कुछ शब्दों और वाक्यों से ही भिन्न मतलब निकाल लिये जाते हैं।
    ३) भाषा के स्वच्छ स्वरूप, जो कि श्रुति रूप है, का संयोजन
    ४) इसमें पढ़ने और लिखने की आवश्यकता नहीं, बस समझने की है जिससे एक निरक्षर भारतीय भी संवाद कर सकता है।
    ५) भारतीय भाषाओं में आने वाले वेबसाइट और जालपृष्ठों को सहज ही दूसरे भाषा में सुना जा सकता है, बिना उस लिपि या अपने लिपि का ज्ञान रखे हुये।
    ६) टीवी पर और रेडियो पर आने वाले कार्यक्रम को सहज ही दूसरी भाषाओं में सभी के लिये उपलब्ध कराया जा सकता है, इसके लिये अलग-अलग रिकौर्डिंग की आवश्यकता नहीं
    ७) ऐसे उपकरण को आसानी से किसी के भी मोबाइल यंत्र में स्थापित किया जा सकता है, जो कि लगभग सभी भारतीय के पास है, जो ससता है, और जिसमें माइक और स्पीकर हमेशा उपलब्ध रहते हैं।
    ८) किसी पुस्तक के अनुवाद के लिये मोबाइल कैमरा का सहज ही प्रयोग किया जा सकता है, जो पृष्ठ के लेख को पढ़कर उसका अनुवादित श्रुति रूप सुना सकता है।
    ९) बोली का रूप समय के साथ बदलता रहता है, जबकि लिखित रूप मूलतः समान रहता है। अतः श्रुति अनुवाद भी समाज के बदलाव के साथ बदल जाता है। 

संस्कृत लिप्यन्तकरण : उपकरण उत्थान संबंधी सुझाव (भाग-७)

१) उपकरण के प्रयोग-आँकड़े : इनको इकट्ठा करना आवश्यक है। इसके लिये जब भी लिप्यन्तरक का कार्य किया जाये, उस डोमेन के लिये एक प्रयोग गिनती बढ़ाई जा सकती है। इससे नये वेबसाइट उपकरण प्रयोग करने से पहले आँकड़े देख सकते हैं।

२) उपकरण के अशुद्धियाँ आँकड़े : उपकरण पूर्णतः सही ना होने से इसमें गलतियाँ होना स्वाभाविक है। विशेष वर्ण, चिन्ह और स्वर के लिये जिनमें अशुद्धियाँ अधिक होने की सम्भावना है, उनके आँकड़ें संयोजे जा सकते हैं।

३) ब्लौग उपकरण के लिये प्लगिन : ब्लौग जैसे ब्लौगर, लाइवजरनल, वर्डप्रेस, टाइपपैड इत्यादि के लिये सहज प्लगिन जिससे इस उपकरण का प्रयोग सुगमता से किया जा सके।

४) गूगल ऐप ईंजन एकाकीकरण : गूगल कोड परियोजना सम्बन्धी जानकारी और चर्चा के लिये अच्छी  है। पर कोड चलाने और उसके प्रयोग आँकड़े इकट्ठा करने के लिये इसके पास सही साधन नहीं है। इसके लिये गूगल ऐप ईंजन और क्लाउड एसक्यूएल का प्रयोग किया जा सकता है।

संस्कृत लिप्यन्तरण
सार्वभौमिक और स्वचालित (भाग-१)
उपकरण रूपरेखा (भाग-२)
विकि विशेष (भाग-३)
तकनीकि विवरण (भाग-४)
संस्कृत वेबसाइट एकीकरण (भाग-५)
भारतीय भाषा अंतः लिप्यन्तरण परियोजना (भाग ६) 
उपकरण उत्थान संबंधी सुझाव (भाग-७)

संस्कृत लिप्यन्तरण : भारतीय भाषा अंतः लिप्यन्तरण परियोजना (भाग ६)

संस्कृत लिप्यन्तरण का गूगल कोड पर निर्यात
संस्कृत लिप्यन्तरण उपकरण अब गूगल कोड पर जीएनयू लाइसेन्स के अन्तर्गत कोड के मुक्त स्त्रोत के रूप में उपलब्ध है। इसके कई लाभ हैं,
१) अंतर्जाल पर अन्य रूचिकर मित्र इसमें एसवीएन के माध्यम से योगदान कर सकते हैं
२) इसके डाउनलोड पृष्ठ पर उपकरण, प्रलेख, परीक्षण इत्यादि जानकारी सुगम उपलब्ध हैं
३) विकि पृष्ठों की सहायता से उपकरण को सुगमता से समझाया जा सकता है
४) गूगल के विस्तारित बुनियादी सुविधाओं जैसे अंतर्जाल से डाउनलोग गति, अधिक एचटीटीपी कनेक्शन, इत्यादि उपकरण के लिये लाभदायक हैं

उपकरण प्रयोग निर्देश
इसकी जानकारी सामान्य प्रयोग निर्देश पर दी गयी है।

भारतीय भाषा अंतः लिप्यन्तरण परियोजना
संस्कृत लिप्यन्तरण परियोजना का भारतीय भाषा अंतः लिप्यन्तरण परियोजना के रूप में विस्तार किया गया है। शुद्ध संस्कृत पर हालांकि क्षेत्रिय विषमतायें कम हैं, और क्षेत्रिय भाषाओं में विशेष वर्णों का अधिक प्रयोग होता है, फिर भी एस प्रयास से किसी भी भारतीय भाषा में लिखे लेख को अपनी लिपि में पढ़ा जा सकेगा।

इसमें प्रत्येक भारतीय भाषा के लिये एक लिप्यन्तरक का निर्माण होगा। यह स्थानीय लिपि को देवनागरी में परिवर्तित कर सकेगा।

सम्बन्धित क्षेत्रों की लिपियाँ आपस में जुड़ी होती हैं। अतः भारत के पूर्वी क्षेत्र (बंगाली, असमिया, नागपुरी इत्यादि), दक्षिणि क्षेत्र (कन्नड़, तेलुगू, मलयालम) इत्यादि के लिये लिप्यन्तरक भी बनाया जा सकता है।

भारतीय भाषा अंतः लिप्यन्तरण परियोजना : लक्ष्य और लाभ
इस परियोजना से जावास्कृप्ट का एक साधारण उपकरण बनाया गया है, जो किसी भी वेबसाइट के लेख को एक लिपि से दूसरे लिपि में लिप्यन्तरिक कर सकेगा।
१) तत्क्षण : उपकरण तुरन्त ही लेख का लिप्यन्तरण करेगा, जिससे पृष्ठ पढ़ने में तनिक भी परेशानी नहीं होगी।
२) सहज एकाकीकरण : जैसा कि सामान्य प्रयोग निर्देश पर समझाया गया है, किसी भी वेबसाइट से इस उपकरण को जोड़ना बहुत आसान है।
३) लघु भार : यह उपकरण १०केबी से भी हल्का है, अतः इसके लोड होने में समय बिल्कुल नहीं लगेगा।
४) सुरक्षित : यह उपकरण पूर्णतः सुरक्षित है। यह ना हि वेबसाइट की किसी जानकारी को पढ़ता, बदलता या संयोजता है।
५) आंशिक लिप्यन्तरण : पृष्ठ के किसी विशेष भाग के लिप्यन्तरण की सुविधा।
६) गूगल कोड : अंतर्जाल पर होने से वेबसाइट की अंतर्जाल गति भी कम नहीं होता, कोड हमेशा उपलब्ध रहता है।
७) संयोजन और प्रिण्ट : पृष्ठ के लिप्यन्तरण हो जाने के पश्चात् इसे लिप्यन्तरित रूप में संयोजा और प्रिण्ट किया जा सकता है।

संस्कृत लिप्यन्तरण
सार्वभौमिक और स्वचालित (भाग-१)
उपकरण रूपरेखा (भाग-२)
विकि विशेष (भाग-३)
तकनीकि विवरण (भाग-४)
संस्कृत वेबसाइट एकीकरण (भाग-५)
भारतीय भाषा अंतः लिप्यन्तरण परियोजना (भाग ६)
उपकरण उत्थान संबंधी सुझाव (भाग-७)